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Monday, July 31, 2017

"गठबंधन का स्वभाव" (चर्चा अंक 2683)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

गठबंधन का तो स्वभाव ही 

खुलना और बँधना है... 

ये बंधन तो प्यार का बंधन है, जन्मों का संगम है यह गीत के बोल हैं करण अर्जुन फिल्म के जो इस वक्त कार में रेडिओ पर बज रहा है. सोचता हूँ कि कितने ही सारे बंधन हैं इस जीवन में. विवाह का बंधन है पत्नी के साथ. प्यार भी ढेर सारा और कितना ही टुनक पुनक हो ले, लौट कर शाम को घर ही जाना होता है और फिर जिन्दगी उसी ढर्रे पर हंसते गाते चलती रहती है . गाने की पंक्ति बज रही है... विश्वास की डोर है ऐसी, अपनों को खीच लाती है... 
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थूहर : 

एक औषधीय वृक्ष 


सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
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शीर्षकहीन 

"ममा, आज स्कूल में हम सभी ने मोमबत्तियां जलाकर कारगिल के शहीदों को श्रद्धाजंलि दी। ममा, हमारा देश सबसे दोस्त बनकर रहना चाहता है फिर ये लड़ाइयाँ क्यो होती हैं।" आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले राहुल ने घर आते ही मां से बातें करने लगा। "बेटा, हमारा देश अहिंसा का पुजारी है। हम किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते। " कहते हुए अंजलि ने टी वी ऑन कर दिया। वहाँ कारगिल युद्ध से संबंधित समाचार आ रहे थे... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर 'मधु' 
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ग़ज़ल ---- 

मर रहा आंखों का पानी देखिए 

बात उसकी आसमानी देखिए । 
मर रहा आंखों का पानी देखिए ।। 
फिर किसी फारुख की गद्दारी दिखी । 
बढ़ रही है बदजुबानी देखिए... 
Naveen Mani Tripathi 
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सैंड टू ऑल 

सैंड टू ऑल की गई 
तुम्हारी तमाम कविताओं में 
ढूँढती हूँ वो चंद पंक्तियाँ 
जो नितान्त व्यक्तिगत होंगी... 
Sunita Shanoo  
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आईना- मेरा दस्तावेज 


डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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राजा हनुवंतसिंह बिसेन, 

कालाकांकर 

अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने में कालाकांकर रियासत का भी अपना एक इतिहास है। अवध (जिला प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश) स्थित इसी रियासत में महात्मा गाँधी ने खुद विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। आजादी की लड़ाई के दौरान लोगों तक क्रांति की आवाज पहुंचाने के लिए हिन्दी अखबार ‘हिन्दोस्थान’ कालाकांकर से ही निकाला गया था। इसमें आजादी की लड़ाई और अंग्रेजों के अत्याचार से संबंधित खबरों को प्रकाशित कर लोगों को जगाने का काम शुरू हुआ। इस तरह यहां की धरती ने स्वतंत्रता की लड़ाई में पत्रकारिता के इतिहास को स्वर्णिम अक्षरों में लिखा। अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल यहाँ के राजा हनवंतसिंह बिसेन ने बजाया था... 
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हम भी हैं पाप के भागी - 

रात्रि आधी से अधिक बीत चुकी थी ,हमलोगों को लौटने में बहुत देर हो गई थी ,उस कालोनी में अँधेरा पड़ा था.कारण बताया गया को कि रात्रि-चर और वन्य-प्राणी भ्रमित न हों इसलिये रोशनियाँ बंद कर दी गई हैं.मन आश्वस्त हुआ . पिछले दिनों एक समाचार बहुत सारे प्रश्न जगा गया था- ऋतु-क्रम में होनेवाली अपनी प्रव्रजन यात्रा में दो हज़ार पक्षी टोरेंटो से जीवित नहीं लौट सके. जी हाँ ,दो हज़ार पक्षी . प्रव्रजन क्रम में काल का ग्रास बन गये. प्रकृति के सुन्दर निष्पाप जीव मनुष्य के सुख-विलास के, उसकी असीमित सुख- लिप्सा की भेंट चढ़ गये.दो हज़ार पक्षी... 
लालित्यम् पर प्रतिभा सक्सेना 
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भाव सुमन 

मन की श्रद्धा, भाव बुद्धि की आह्लाद हृदय का अर्पित सबको 
तन के कर्म, श्रद्धानवत होकर शत शत वंदन करते हैं सबको... 
pragyan-vigyan पर Dr.J.P.Tiwari  
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पूर्वोत्तर भारत: 

इनर लाइन परमिट कैसे प्राप्त करें?  

TRAVEL WITH RD पर RD PRAJAPATI  
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जा और किसी को यार बना 

ख़ुद का ख़ुद ही मुख़्तार बना 
यूँ ग़ाफ़िल भी सरदार बना... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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Kitni Barishon Me 

सतीश का संसार पर satish jayaswal  
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ज्ञान की बाते 

VMW Team   

Sunday, July 30, 2017

"इंसान की सच्चाई" (चर्चा अंक 2682)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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प्रतिबद्धता के नाम पर 

साहित्यकारों को अपनी इस दोगलई से 

हर हाल बाज आना चाहिए 

‘साहित्य का उद्देश्य’ में प्रेमचंद ने लिखा था, ‘हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी।’ तो बदली स्थितियों में भी इस कसौटी को बदलने की ज़रुरत आन पड़ी है। इस लिए भी कि प्रेमचंद इस निबंध में एक और बात कहते हैं, ‘वह (साहित्य) देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्‍चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई सच्‍चाई है।’ इस दोगले समय में प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकार जिस तरह प्रेमचंद के इस कहे पर पेशाब करते हुए राजनीति के पीछे साहित्य की मशाल ले कर भेड़ की तरह चल पड़े हैं , वह उन्हें हास्यास्पद बना चुका है । पुरस्कार वापसी के नाम पर गिरोहबंदी कर जिस जातीय और दोगली राजनीति के पीछे साहित्यकार खड़े हुए हैं , बीते कुछ समय से साहित्यकारों को भी इस प्रवृत्ति ने दोगला बना दिया है । मुझे अपनी ही एक ग़ज़ल याद आती है :
प्रेमचंद को पढ़ कर  खोजा बहुत पर फिर वह मिसाल नहीं मिली
राजनीति के आगे चलने वाली साहित्य की वह मशाल नहीं मिली... 

सरोकारनामा पर Dayanand Pandey 
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शाम 


तिश्नगी पर आशीष नैथाऩी  
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बरखा बहार आयी 

सूरज की तपन गई बरखा बहार आयी
झुलसी-मुरझाई धरा पर हरियाली छायी... 
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देखी तेरी चतुराई 

 कल राजस्थान के जोधपुर में एक हादसा होते-होते बचा। हवाई-जहाज से पक्षी टकराया, विमान लड़खड़ाया लेकिन पायलेट ने अपनी सूझ-बूझ से स्थिति को सम्भाल लिया। यह खबर है सभी के लिये लेकिन इस खबर के अन्दर जो खबर है, वह हमारा गौरव और विश्वास बढ़ाती है। महिला पायलेट ने जैसे ही पक्षी के टकराने पर हुआ विस्फोट सुना, उसने तत्क्षण जहाज को ऊपर उड़ा दिया और इंजन बन्द करके जहाज को उतार लिया। सभी यात्री सुरक्षित उतर गये। महिला पायलेट के नाम से मन थोड़ा तो घबराता था ही... 
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सपने में मुलाक़ात 

जब कभी हम मिले, 
तुम्हारे साथ कोई था. 
मैं अब तक नहीं समझा 
कि मुझमें ऐसा क्या है, 
जो तुम्हें मुझसे 
अकेले में मिलने से रोकता है... 
कविताएँ पर Onkar 
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ग़ज़ल  

बाकी अभी है और फ़ज़ीहत कहाँ कहाँ 

लेंगे हजार बार नसीहत कहाँ कहाँ । 
बाकी अभी है और फ़जीहत कहाँ कहाँ... 
Naveen Mani Tripathi  
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आज के इंसान की सच्चाई 

... ये कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं ये आज के इंसान की सच्चाई है। मानव से अगर मानवता चली जाए तो वो मानव नहीं रहता दानव बन जाता है…और शायद हममें से ज्यादातर लोग दानव बन चुके हैं। हम अपने लिए पैदा होते हैं….अपने लिए जीते हैं और अपने लिए ही मर जाते हैं….ये भी कोई जीना हुआ! चलिए एक बार फिर से मानव बनने का प्रयास करते हैं…चलिए अपने घरों में बेकार पड़े कपड़े ज़रूरतमंदों के देते हैं…चलिए…कुछ गरीबों को खाना खिलाते हैं….चलिए….किसी गरीब बच्चे को पढ़ाने का संकल्प लेते हैं….चलिए एक बार फिर से मानव बनते हैं। 
राज भाटिय़ा 

पंखुपड़ियाँ ... 

24 कहानियो का संग्रह 

आई ब्लॉगर का संचालन करने वाली फर्म प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित होने जा रही 
में आमंत्रित है मात्र 2000 से 3000 शब्दों की मौलिक  अप्रकाशित कहानी
उपरोक्त कहानी संग्रह की बिक्री लाभ (आय) का 75 प्रतिशत भाग के 24 लेखक बराबर के भागीदार रहेंगे अथवा प्रति ई-बुककी बिक्री की आय का 75 प्रतिशत भाग 24 लेखकों को देय होगा।
विस्तार से पढ़िए.... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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प्रतिकार 

खेल शुरू हुआ था एक दूसरे पर गुलाब की पाँखुरियाँ फेंकने से ! खुशबूदार, रेशम सी कोमल, चिकनी, मुलायम पाँखुरियाँ ! सुखद अहसास जगातीं ! स्वयं को विशिष्ट होने का भान करातीं ! मन को आल्हाद से भरतीं फूलों की पाँखुरियाँ ! फिर जब पंखुरियाँ ख़त्म हो गयीं तो उनकी जगह फूल फेंके जाने लगे... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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वंदेमातरम्‌ की अनिवार्यता पर संग्राम  

प्रमोद भार्गव 

राष्‍ट्रगीत ‘वंदे मातरम्‌‘ को तमिलनाडु के विद्यालयों में अनिवार्य करने के उच्‍च न्‍यायालय के फैसले पर तमिलनाडु में भले ही कोई बवाल न मचा हो, लेकिन इसी परिप्रेक्ष्‍य में महाराष्‍ट्र में उबाल है। वंदे मातरम्‌ को लेकर मुसलिम समुदाय के एक वर्ग और राजनीतिक दलों ने विरोध जताया है। खासतौर से ऑल इंडिया मजलिसे-इत्तेहादुल मुसलमीन के विधायक वारिस पठान ने कहा है कि 
मेरे सिर पर रिवॉल्‍वर भी रख दें तो भी... 
Ravishankar Shrivastava 
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"पूज्य पिता जी आपको श्रद्धापूर्वक नमन"  

2014 में आज ही के दिन आप विदा हुए थे।
पूज्य पिता जी आपकावन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके हो गयाजीवन मुझ पर भार।।
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बचपन मेरा खो गयाहुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, करने हैं सब काज।।
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जब तक मेरे शीश पररहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष काछूट गया है साथ।।
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प्रभु मुझको बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार।
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।

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