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Monday, August 21, 2017

"बच्चे होते स्वयं खिलौने" (चर्चा अंक 2703)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा. 

अपनी मित्र कल्पना की एक कविता 
यहाँ प्रस्तुत करने का 
लोभ नहीं संवरण कर पा रही हूँ. - 
प्रतिभा. ... 
शिप्रा की लहरें पर प्रतिभा सक्सेना 
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इतिहास व महापुरुष हथियाने की कोशिश 

भारत में सदियों से जाति व्यवस्था रही है। सभी जातियां अन्य दूसरी जातियों का सम्मान करते हुए, एक साझी संस्कृति में प्रेमपूर्वक रहती आई है। देश के महापुरुष भले किसी जाति के हों, वे सबके लिए आदरणीय व प्रेरणास्त्रोत होते थे। लेकिन आजादी के बाद देश के नेताओं ने एक तरफ जहाँ जातिवाद खत्म करने की मोटी मोटी बातें की, वहीं वोट बैंक की फसल काटने हेतु जातिवाद को प्रत्यक्ष बढ़ावा दिया। जिससे कई जातियों में प्रबल जातीय भाव बढ़ा और वे दूसरी जातियों पर राजनैतिक वर्चस्व बनाने के लिए लामबंद हो गई। नतीजा जातीय सौहार्द को तगड़ा नुकसान पहुंचा। महापुरुषों को भी जातीय आधार पर बाँट दिया गया। आजकल यह रिवाज सा ही प्रचलित हो गया कि महापुरुषों की जयन्तियां व उनकी स्मृति में आयोजन उनकी जाति के लोग ही करते है, बाकी को कोई मतलब नहीं रह गया... 
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आनंद 

उलझें रहे हम तुम सवालों में 
रंगीन आसमानी नज़रों में कभी चाँद 
कभी सितारें ढूँढ रहे अपने जबाबों में 
सुध बुध बस कुछ नहीं 
तल्लीन वक़्त के ख्यालों में ... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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महफ़ूज 

वो अक्सर ख्यालों में ही महफ़ूज रहे 
सामने जब जब आए 
नजरें चुरा के चले गए... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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विश्वास 

‘विश्वास’ कितना आभासी है ना यह शब्द ! 
कितना क्षणिक, 
कितना छलनामय, 
कितना भ्रामक... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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एहसां जताने लगे... 

ज़रा-से करम को ज़माने लगे 
ख़ुदा रोज़ एहसां जताने लगे... 
साझा आसमान पर Suresh Swapnil 
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एक रीत बदल दूँ ........ 

झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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ये तो लगाए ही जाते हैं तोड़ने के लिए 

आज थोड़ी लम्बी बात कर लेने दीजिए। कम से कम पैंतालीस बरस पहले की बात है यह। उम्र के छब्बीसवें बरस में था। मन्दसौर में काम कर रहा था। एक शुद्ध शाकाहारी, अहिंसक परिवार का, मुझसे नौ-दस बरस छोटा एक किशोर मेरे परिचय क्षेत्र में था। प्रायः रोज ही मिलना होता था उससे। मैंने अनुभव किया कि कुछ दिनों से वह अनमना, उचाट मनःस्थिति में चल रहा है। हम लोग अच्छी-भली बात कर रहे होते कि अचानक ही उठ खड़ा होता - ‘चलूँगा भैया।’ मैं रोकता तो नहीं किन्तु लगता, मेरी किसी बात से अचानक ही खिन्न हो गया होगा। मैं अपनी कही बातों को याद करने की कोशिश करता। सब ठीक-ठाक लगता। फिर भी एक अपराध-भाव मुझे घेर लेता। ऐसा लगाता...  
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वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है 

नहीं कुछ प्यार में अब तो रखा है 
वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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Sunday, August 20, 2017

"चौमासे का रूप" (चर्चा अंक 2702)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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स्वाभिमानी 

माना ज्ञानी नहीं अज्ञानी हूँ मैं 
फ़िर भी गुरुर से सराबोर रहता हूँ 
मैं तिलक हूँ किसीके माथे का 
महक से इसकी नाशामंद रहता हूँ... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 

अस्तित्व 

रेलगाड़ी की दो पटरियां 
एक दूसरे का साथ देती 
चलती चली जाती हैं 
एक ही मंजिल की ओर... 
कविताएँ पर Onkar 
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चाह मेरी जाके मैख़ाने लगी 

जिस अदा से आ मेरे शाने लगी 
मुझको अब रुस्वाई भी भाने लगी... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है 

मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा बना रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं ये पक्षी? मन में प्रश्न था। शायद ये कहीं दूर से आए हैं और इनने अपना ठिकाना कुछ दिनों के लिये यहाँ बसा लिया है... 
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....हमारी ओर से भी अब पासे श्री कृष्ण फैंकेंगे.... 

आज़ादी की 71वीं वर्षगाँठ पर पूछता हूं मैं, भ्रष्ट नेताओं से बिके हुए अधिकारियों से, स्वतंत्रता दिवस पर या गणतंत्रता दिवस पर तुम तिरंगा क्यों लहराते हो? ...तुम क्या जानो तिरंगे का मोल... एक वो थे, जो आजादी के लिये मर-मिटे एक ये हैं, जो आजादी को मिटा रहे नेताओं को चंदा मिल रहा, और अधिकारियों को कमिशन फिर राष्ट्रीय दिवस क्यों मनाते हो? ...तुम क्या जानों इन पर्वों का मोल.... कल हम अंग्रेजों के गुलाम थे, और आज भ्रष्टाचार के कल जयचंद के कारण गुलाम हुए, आज भी कुछ लोग हैं उसी परिवार के, जो रक्षकों पर पत्थर बरसा रहे, चो वंदे मातरम न गा रहे, होने वाला है कृष्ण का अवतार अब, ... 
kuldeep thakur 
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राष्ट्रभक्ति 

राष्ट्रभक्ति के नाम पर काली कमाई करने वाले बेहिसाब लोग हैं, पर कुछ ऐसे भी दृष्टांत जानकारी में आते हैं कि आभावों में पलने वाले कई लोगों का देशप्रेम का ज़ज्बा अमीर लोगों की सोच से बहुत ऊपर होता है. ऐसा ही एक सच्च्चा किस्सा है कि झोपडपट्टी में पलने वाला एक १० वर्षीय बालक व्यस्त शहर की एक लाल बत्ती पर अपने पुराने से वाइपर पर पोचे का गीला कपड़ा बाँध कर खड़ी कारों के शीशों को बिना पूछे ही साफ़ करने लगता है, कुछ दयावान लोह उसे छुट्टे सिक्के दे भी जाते हैं; एक बड़े सेठ जी को अपनी लक्ज़री कार के शीशे पर उसका ये पोचा लगाना हमेशा नागवार गुजरता है, 
बालक ‘जो दे उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला ... 
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थोथा चना बाजे घना 

शांत गहरे सागर रहते झर झर झर झरने छलकते , 
ज्ञानी मौन यहां पर रहें पोंगे पण्डित ज्ञान देवें , 
थोथा चना बाजे घना 
गुणगान करे अपना *यहां*... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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नदी 

नदी अब वैसी नहीं रही 
नदी में तैरते हैं नोटों के बंडल, 
बच्चों की लाशें 
गिरगिट हो चुकी है नदी... 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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सरकारी आदेश का पालन:  

जैसा तूने गाया, 

वैसा मैंने बजाया 

यह घटना इसी रविवार, तेरह अगस्त की है। यह घटना मुझे इसके नायक ने आमने-समाने बैठकर सुनाई है। वास्तविकता मुझे बिलकुल ही नहीं मालूम। इस घटना का नायक मध्य प्रदेश सरकार के, ग्रामीण सेवाओं से जुड़े विभाग का कर्मचारी है। उसके जिम्मे 19 गाँवों का प्रभार है। प्रदेश सरकार ने इस विभाग के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों को एक-एक सिम दे दी है। इनके लिए एण्ड्राइड फोन अनिवार्य है। सबको वाट्स एप से जोड़ दिया गया है और कह दिया गया है कि वाट्स एप पर मिले सन्देश को राज्य सरकार का औपचारिक और आधिकारिक आदेश माना जाए... 
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