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Wednesday, November 30, 2016

"कवि लिखने से डरता हूँ" (चर्चा अंक-2542)

मित्रों 
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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तुझको चलना होगा 

कुछ तो बोल। 
हम पिछले घंटे भर से एकदम चुप बैठे हैं। 
बॉय द वे , तू सोच क्या रही है ? 
हम क्यों नहीं बहते इस झरने की तरह ? 
क्योंकि हम इतने सरल नहीं होते। 
न जाने कहाँ -कहाँ की सोचों में 
दिमाग घुमाते रहते हैं... 
Sehar पर Ria Sharma 
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गीत 

"कवि लिखने से डरता हूँ" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

घर-आँगन-कानन में जाकर,
केवल तुकबन्दी करता हूँ।
अनुभावों का अनुगायक हूँ,
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।

है नहीं मापनी का गुनिया,
अब तो अतुकान्त लिखे दुनिया।
असमंजस में हैं सब बालक,
क्या याद करे इनको मुनिया।
मैं बन करके पागल कोकिल,
कोरे पन्नों को भरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ... 
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हासिल 

कितनी बातें थीं कहने को 
जो हम कहते तुम सुन लेते 
कितनी बातें थी सुनने को 
जो तुम कहते हम सुन लेते ! 
लेकिन कुछ कहने से पहले 
घड़ी वक्त की ठहर गयी  
सुनने को आतुर प्राणों की 
आस टूट कर बिखर गयी... 
Sudhinama पर 
sadhana vaid 
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मुक्तक -  

सुबह जैसे ही आँख खुलती है 

सुबह जैसे ही आँख खुलती है
मानो एक शिकायत किया करती है
भोर होते ही क्यू छोड़ देता है मुझको
मेरी तनहाई मुझसे यही सवाल किया करती है... 
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नोटबंदी 

आज देश लाइन में लगा है, वैसे भी लोगों को लाइन में लगने की आदत सी है, कोई नयी फिल्म का पहला दिन हो तो टिकिट खिड़की पर लंबी लाइन ,जैसे पहले दिन ही किला फतह करना हैं. फ़िल्मी सितारों के दर्शन हों या लालबाग का राजा , स्कूल में एडमिशन हो या परीक्षा के फॉर्म,जिओ फ्री फ़ोन मिले या रिचार्ज , राशन - पानी या पेट्रोल - या चौकी धानी, हर जगह लाइन का अनुशासन बरक़रार है इसीलिए सरकार को हमारी दरकार है। फिर नोट बदलने के लिए इस लंबी लाइन पर विपक्ष काहे भड़क रहा है, अब का करें मिडिया को भी रोज तमाशा देखने की आदत पड़ गयी है। तमाशा करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैं... 
shashi purwar 
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तारों की छाया मेँ मिल के , 

आ दूर कहीं अब चल दें हम 

जब चाँद छुपा है बादल मेँ, 
तब रात यहॉं खिल जाती है 
घूँघट ओढ़ा है अम्बर मेँ... 
Ocean of Bliss पर 
Rekha Joshi 
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कभी कभी!! 

कभी कभी कहानियाँ यूँ खत्म हो जाती है ! 
वक़्त का मरहम मिलता नहीं तो जैसे ज़ख्म हो जाती है !! 
रिस जाती है आह भी दिल के लहू में... 
Parul Kanani 
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692 

नन्हा भरतू  और भारतबन्द 

डा कविता भट्ट 

सुबह से शाम तक, कूड़े से प्लास्टिक-खिलौने बीनता नन्हा भरतू 

किसी कतार में नहीं लगता, चक्का जाम न भारत बंद करता है 

दरवाजा है न छत उसकी वो बंद करे भी तो क्या 

वो तो बस हर शाम की दाल-रोटी का प्रबंध करता है.... 

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तुम्हारा आना ... 

'कुछ ठहरले...' (गीत-संग्रह) के बाद 
यह दूसरा काव्य-संग्रह 'अजनबी शहर में ' 
अभी प्राप्त हुआ है .  
उम्मीद है कि इसे पढ़ते हुए भी 
आप अपनापन महसूस करेंगे . 
संग्रह की एक और कविता यहाँ दे रही हूँ -- 
ख़यालों में तुम्हारा आना...
Yeh Mera Jahaan पर 
गिरिजा कुलश्रेष्ठ 
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जीवन धूप और छाव 

कभी धूप तो कभी छाव है 
जिंदगी मीठे खट्टे अनुभव का नाम है 
जिंदगी कुदरत की नियामत है 
जिंदगी अगर ये जिंदगी न होती 
तो क्या होता... 
aashaye पर 
garima 
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कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो ... 

हम झूठ भी कहेंगे तो सच मानते हैं वो 
कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं... 
Digamber Naswa,

Tuesday, November 29, 2016

"देश का कालाधन देश में" (चर्चा अंक-2541)

मित्रों 
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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सुबह की बातें- 

देवेन्द्र पाण्डेय 

देश का कालाधन देश में : 

एक आर्थिक विमर्श 

करेंसी के बंद होने या कहें सरकार द्वारा बंद करने के बाद की परिस्थियां ऐसी क्यों हैं कि जनता कष्ट भोगने के बावजूद भी सरकार के साथ कड़ी है. ?
ऐसा लगता है जनता को बेहद भरोसा है और  उम्मीद भी है कि सरकार का हर कदम जनोन्मुख है. सरकार की यह कोशिश आर्थिक विषमता को दूर करेगी. प्रथम दृष्टया दिख भी यही रहा है. अपने बिस्तर के नीचे नोट बिछा कर गर्वीली नींद सोने वालों के लिए- “मेरे प्यारे देशवाषियों” से प्रारम्भ होने वाला भाषण भयावह लग रहा होगा पर गरीब व्यक्ति निम्न और उच्च मध्यवर्ग का व्यक्ति दाल-रोटी के साथ  बिना सलाद खाए चैन की नींद सो रहा है.  चिल्लर के अभाव में  जाड़े के दिनों में मूली-अमरूद के सलाद का जुगाड़ जो नहीं हो पा रहा ... जब स्व. राजीव जी ने कहा था – “हम एक रुपये भेजते हैं आप तक पंद्रह पैसे पहुंचाते हैं तो बड़ा प्रभावित थी जनता तो एक दिन का उपवास भी तो रखा था स्व. शास्त्री जी की सलाह पर... !”
यानी इस देश की जनता जब किसी को प्रधान-मंत्री जी बनाती है तो विश्वास की डोर से खुद-ब-खुद बांध जाती है उस व्यक्तित्व से ..! 
इसी तंतु के सहारे देश का प्रजातंत्र बेहद शक्तिशाली नज़र आता है.... 
गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
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चीन यात्रा - १८ 

...व्यक्तिगत रूप से जितना सीखने को मिला, वह संभवतः पढ़कर सीख पाना संभव नहीं था। संस्कृतियाँ सोचने का ढंग बदल देती हैं। जब सब एक सा सोचते हैं तभी शक्ति का उद्भव होता है... 
Praveen Pandey 
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मानव नाग... 

सुनो   
अगर सुन सको तो   
ओ मानव केंचुल में छुपे नाग   
डँसने की आज़ादी तो मिल गई तुम्हें   
पर जीत ही जाओगे   
यह भ्रम क्यों   
केंचुल की ओट में छुपकर   
नाग जाति का अपमान   
करते हो क्यों   
नाग बेवजह नहीं डँसता... 
डॉ. जेन्नी शबनम 
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परिवर्तन रैली के बहाने 

प्रधानमंत्री ने कुशीनगर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि "हम भ्रष्टाचार और कालाधन बंद करने का काम कर रहे हैं, विपक्ष भारत बंद करने का।" उनके कहने का आशय यह है कि विपक्ष उनके साथ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा है। नोटबंदी जैसा बड़ा परिवर्तन लाने के बाद अब मोदी जी उत्तर प्रदेश में परिवर्तन यात्रा पर हैं। वैसे भी सबसे ज्यादा परिवर्तन की जरूरत यहीं है। देखने वाली बात ये होगी कि यूपी की जनता भाजपा के विरुद्ध बाक़ी पार्टियों के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करती है या अपने देश भक्ति के प्रमाण पत्र को रद्द होने से बचाती है। प्रधानमंत्री आधुनिक लेनिन हैं पूंजीपतियों को कंगाल करके मानेंगे... 
abhishek shukla 
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टिकाऊ विकास से 

बचेंगी भावी पीढ़ियां 

यह समझना ज़रूरी कि हम सारे संसाधन खुद ही खर्च कर देंगे या कुछ बचाकर भी रखेंगे। * मंजीत ठाकुर इस वक्त जब पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर खास चिंताएं हैं, और हाल ही में दुनिया भर ने दिल्ली में फैले दमघोंटू धुएं का कहर देखा, एक दफा फिर से आबो-हवा की देखभाल और उसकी चिंताएं और उससे जुड़े कारोबार पर गौर करना बेहद महत्वपूर्ण लगने लगा है। सबसे बड़ी बात कि हम लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या संसाधन छोड़कर जाने वाले हैं? क्या हम उनको प्रदूषित पानी, बंजर ज़मीन और सांस न लेने लायक हवा की सौगात विरासत के रूप में देने वाले हैं... 
Manjit Thakur 
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मानव धर्म 

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की। 
नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की। 
नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो। 
नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो... 
Laxman Bishnoi Lakshya  
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वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला 

बात क्या है के बना प्यार जताने वाला 
घाव सीने में कभी था जो लगाने वाला 
अब मेरे दिल में जो आता है चला जाता है क्यूँ 
काश जाता न कभी याँ से हर आने वाला... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
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तुम्हें कुत्तों का भौंकना सुनाई नहीं दिया ? 

विजय गौड़  
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"मैं कौन हूँ"  

बहुत पहले एक मलयालमी कहानी पढ़ी थी, यह मेरे जेहन में हमेशा बनी रहती है। आप भी सुनिए – एक चींटा था, उसे यह जानने की धुन सवार हो गयी कि "मैं कौन हूँ"। उसे सभी ने राय दी कि तुम गुरुजी के पास जाओ वे तुम्हारी समस्या का निदान कर देंगे। वह गुरुजी के पास गया, उनसे वही प्रश्न किया कि "मैं कौन हूँ"। गुरुजी ने कहा कि यह जानने के लिये तुम्हें शिक्षा लेनी होगी। वह चींटा गुरुजी की पाठशाला में भर्ती हो गया, अब वह वहाँ अक्षर ज्ञान सीखने लगा लेकिन कुछ दिन ही बीते थे कि उसने फिर वही प्रश्न किया - "मैं कौन हूँ"... 
smt. Ajit Gupta 
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वक्त के साथ हर सोच बदल जाती है...

मेरी एक गज़ल का शेर है: 
कैसे जीना है किसी को ये बताना कैसा, 
वक्त के साथ हर सोच बदल जाती है... ..  
जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है...  
वाकई इन १५ दिनों के भीतर पूरी की पूरी सोच ही बदल गई. शब्दों और मुहावरों के मायने बदल गये हैं..जहाँ एक ओर लोग विमुद्रीकरण जैसे किलिष्ट शब्द का अर्थ समझ गये.. वहीं इसे एक नया ’नोटबंदी’ जैसा नाम मिला..मानों कि काले धन की बढ़ती आबादी को रोकने हेतु नोटों की नसबन्दी कर दी गई हो... 
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