फ़ॉलोअर



यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, अगस्त 24, 2016

चुपके से मन पोट ली, ली पोटली तलाश -चर्चा मंच 2444

मन के मनके जोड़, विहँसती चुपके चुपके - 

"कुछ कहना है"

चुपके से मन पोट ली, ली पोटली तलाश | 
यादों के पन्ने पलट, पाती लम्हे ख़ास |  

पाती लम्हे ख़ास, प्रेम पाती इक पाती | 
कोरा दर्पण-दर्प, और फिर प्रिया अघाती | 
शंख सीप जल रत्न, कौड़ियां गिनती छुपके | 
मन के मनके जोड़, विहँसती चुपके चुपके || 

कपास सी छुअन 

रश्मि शर्मा 

क्यों 

Asha Saxena 

गीत  

"शब्दों के मौन निमन्त्रण" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 


शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।