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बुधवार, अगस्त 17, 2016

"क्या सच में गाँव बदल रहे हैं?" (चर्चा अंक-2437)

मित्रों 
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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गीत "राखी का त्यौहार"  

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

आया राखी का त्यौहार!!
हरियाला सावन ले आयाये पावन उपहार।
अमर रहा हैअमर रहेगाराखी का त्यौहार।।
आया राखी का त्यौहार!!
जितनी ममता होती है, माता की मृदु लोरी में,
उससे भी ज्यादा ममता है, राखी की डोरी में,
भरा हुआ कच्चे धागों में, भाई-बहन का प्यार।
अमर रहा हैअमर रहेगाराखी का त्यौहार।।
आया राखी का त्यौहार... 
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तपस्या 

कलयुग में सबने सीख दी - "सीता बनो" 
यह सुनकर स्त्री या तो मूक चित्र हो गई 
या फिर विरोध किया "क्यूँ बनूँ सीता ? 
राम होकर पुरुष दिखाये !" ....  
रश्मि प्रभा... 
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हम हुए आजाद.......,  

कि आज रोटी पकेगी। 

हुयी महंगी दाल कि तरकारी रंधेगी........  
हम हुए आज़ाद.......... डंडे खाये -लाठी खायी  
और कुछ ने तो अपनी गरदन भी कटवायी, 
कि जश्न पै आज मुला दारू बटेगी... 
अन्तर्गगन पर धीरेन्द्र अस्थाना 
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जय भारत !  

(स्वतंत्रता दिवस पर 10 हाइकु) 

1.   
तिरंगा झूमा    
देख आज़ादी का जश्न,   
जय भारत !  
2.   
मुट्ठी में झंडा   
पाई-पाई माँगता  
देश का लाल !   
3... 
डॉ. जेन्नी शबनम 
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न कुछ बदला 

न आए दिन सुहाने 

वही हालात हैं अब तक पुराने न 
कुछ बदला न आए दिन सुहाने 
किसे मतलब है ज़ख़्मों से हमारे 
कोई आता नहीं मरहम लगाने... 
हिमकर श्याम 
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वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ... 

लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए 
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए 
हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों 
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए... 
स्वप्न मेरे ...पर Digamber Naswa 
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मन जाना राष्ट्रीय पर्व का 

वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। दुःख होता है यह देख कर कि अब इस पर्व को मनाया नहीं बस किसी तरह निपटाया जाता है... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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पूर्वोत्तर में भी सिपाहियों ने की थी 

मंगल पांडे जैसी बगावत...!! 

जब भी देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात् 1857 में सिपाहियों के विद्रोह (Sepoy Mutiny) की बात चलती है तो हमेशा मेरठ, झाँसी, दिल्ली, ग्वालियर जैसे इलाकों और बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे कुछ राज्यों तक सीमित होकर रह जाती है. आज़ादी की अलख जगाने वाले इस सबसे पहले विद्रोह को आमतौर पर उत्तर भारत तक सीमित कर दिया गया है. शायद इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि विद्रोह की आग पूर्वोत्तर के राज्यों तक भी आई थी और असम-त्रिपुरा जैसे राज्यों के सिपाहियों की इस विद्रोह में अहम् भूमिका भी थी... 
सादर ब्लॉगस्ते! पर संजीव शर्मा 
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क्या सच में गाँव बदल रहे हैं? 

इन लड़कियों की अल्हड़ता क्या ऐसी ही बनी रहेगी? इन लड़कों का नृत्य क्या ऐसे ही देश प्रेम को सार्थक करता रहेगा? क्या इन नन्हें बच्चों में से कोई गाँव की कमान सम्भाल लेगा? स्वतंत्रता दिवस की यह साफ-सफाई क्य़ा हमेशा ही गाँव को स्वच्छ बना देगी? क्या महिलायें पूरी शक्ति के साथ ऐसे ही घर-परिवार और देश के झण्डे को लहराती रहेंगी? पोस्ट को पढ़ने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें -  
smt. Ajit Gupta 
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