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Monday, November 30, 2015

यही मुल्क है जहॉ मुसलमान राष्ट्रपति बन जाता है---चर्चा अंक 2176

जय माँ हाटेश्वरी...
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"तुने कहा,सुना हमने अब मन टटोलकर सुन ले तु,   सुन ओ आमीर खान,अब कान खोलकर सुन ले तु,"
तुमको शायद इस हरकत पे शरम नही आने की,  तुमने हीम्मत कैसे की जोखीम मॅ हमॅ बताने की..
शस्य श्यामला इस धरती के जैसा जग मॅ और नही, भारत माता की गोदी से प्यारा कोई ठौर नही
घर से बाहर जरा नीकल के अकल खुजाकर पुछो, हम कीतने है यहॉ सुरक्षीत, हम से आकर पुछो
पुछो हमसे गैर मुल्क मॅ मुस्लीम कैसे जीते है, पाक, सीरीया, फीलस्तीन मॅ खुन् के आन्सु पीते है
लेबनान, टर्की,इराक मॅ भीषण हाहाकार हुए, अल बगदादी के हाथॉ मस्जीद मॅ नर सन्हार हुए
इजरायल की गली गली मॅ मुस्लीम मारा जाता है, अफगानी सडकॉ पर जीन्दा शीश उतारा जाता है
यही सीर्फ वह देश जहॉ सीर गौरव से तन जाता है, यही मुल्क है जहॉ मुसलमान राष्ट्रपती बन जाता है
इसकी आजादी की खातीर हम भी सबकुछ भुले थे, हम ही अशफाकुल्ला बन फान्सी के फन्दे झुले थे
हमने ही अन्ग्रेजॉ की लाशॉ से धरा पटा दी थी, खान अजीमुल्ला बन लन्दन को धुल चटा दी थी
ब्रीगेडीयर उस्मान अली इक शोला थे,अन्गारे थे, उस सीर्फ अकेले ने सौ पाकीस्तानी मारे थे
हवलदार अब्दुल हमीद बेखौफ रहे आघातॉ से, जान गई पर नही छुटने दीया तीरन्गा हाथॉ से
करगील मॅ भी हमने बनकर हनीफ हुन्कारा था, वहॉ मुसर्रफ के चुहॉ को खॅच खॅच के मारा था
मीटे मगर मरते दम तक हम मॅ जीन्दा ईमान रहा, होठॉ पे कलमा रसुल का दील मॅ हीन्दुस्तान रहा
इसीलीए कहता हुन् तुझसे,युन् भडकाना बन्द करो, जाकर अपनी फील्मॅ कर लो हमॅ लडाना बन्द करो
बन्द करो नफरत की स्याही से लीक्खी पर्चेबाजी, बन्द करो इस हन्गामॅ को, बन्द करो ये लफ्फाजी
यहॉ सभी को राष्ट्र वाद के धारे मॅ बहना होगा, भारत मॅ भारत माता का बनकर ही रहना होगा
भारत माता की बोली भाषा से जीनको प्यार नही, उनको भारत मॅ रहने का कोई भी अधीकार नही"
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"कवि अब्दुल गफ्फार(जयपुर) की ताजा रचना" के बाद पेश है...मेरे द्वारा प्रस्तुत आज की चर्चा इन लिंको के साथ... 
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 डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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खिचड़ी अब कैसे पके, मँहगी काली दाल।
अरहर-मूँग-मसूर का, रूप हुआ विकराल।।
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मँहगाई तो देश में, मचा रही कुहराम।
गाजर-आलू-मटर के, बढ़े हुए हैं दाम।।
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राजेंद्र कुमार 
सत्ता बेलगाम है जनता गूँगी बहरी लगती है |
कोई उज़्र न करने वाला कोई नहीं सवाली है ||
सच को यूँ मजबूर किया है देखो झूठ बयानी पर |
माला फूल गले में लटके पीछे सटी दोनाली है ||
दौलत शोहरत बँगला गाड़ी के पीछे सब भाग रहे हैं |
फसल जिस्म की हरी भरी है ज़हनी रक़बा खाली है || 
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 डॉ० कौशलेन्द्र 
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असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रद्रोह, धर्मनिरपेक्षता और प्रतिक्रिया जैसे शब्द जितने गम्भीर हैं उतना ही सतही उनका राजनैतिक व्यवहार हो गया
है। यह अपने आप में एक गम्भीर चिंता का विषय है। इन विषयों पर अपने विचार रखते समय हम हिंदू या मुसलमान होने और न होने की दृष्टि से चिंतन करते हैं और यही सबसे
त्रुटिपूर्ण बात है। कोई हिन्दू बात करता है तो वह असहिष्णु और सम्प्रदायवादी मान लिया जाता है। कोई मुसलमान बात करे तो वह राष्ट्रद्रोही मान लिया जाता है।
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अरुण कुमार निगम 
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 बढते कदम हों तो उत्कर्ष जीवन
भटके कदम तब तो अपकर्ष जीवन
मिल जाए जो ध्येय तो हर्ष जीवन
विपदाएं हों तो है संघर्ष जीवन
ये धरती गीतों की धरती है टिकरी कहे म ऐसे लगथे कि सचमुच म इहाँ कवि कोदूराम दलित जी जन्मे रहिस के नहीं, हमू ला बाद में पता चलिस कि इहाँ के धरती म गीत बसे
हे कविता बसे हे.तभे त खींचथे मन ला, गागड़ा भाई इसने थोड़े न आ जाही.... 
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कलम से.. 
" क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?? "
बेटे ने जवाब दिया" नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा। "
वृद्ध ने कहा " बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येकपिता के लिए उम्मीद (आशा)। "
दोस्तो आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसँद नही करते और कहते है क्या करोगो आप से चला तो जाता नही ठीक से खाया भी नही जाता
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 प्रमोद जोशी 
नेहरू की विरासत को लेकर बहस फिर से चल निकली है। हाल में नेहरू मेमोरियल को लेकर विवादास्पद बातें हुईं। दूसरी ओर सरकार आम्बेडकर और पटेल की छवि को स्थापित
करने की कोशिश कर रही है। इसे सहज रूप से लिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने भी तो नेहरू को स्थापित किया था। राष्ट्रीय महापुरुषों और नायकों के नाम राजनीति के साथ
बदलते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार बनने के बाद अनेक संस्थाओं के नाम दलित महापुरुषों पर रखे गए। इसमें गलत क्या हुआ? यह भी समय की माँग थी। पर यह
राजनीति किसी नाम को मिटाने की नहीं होनी चाहिए।
दो दिन की चर्चा में धर्म निरपेक्षता, मौलिक अधिकार, संघवाद और संवैधानिकता से जुड़े अनेक प्रश्न उठे जिनपर देशभर में मीडिया के मार्फत चर्चा होनी चाहिए। इस
सत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था प्रधानमंत्री का वक्तव्य जिसमें उन्होंने समावेशी, समन्वयकारी, न्याय की राह पर चलने की बात कही है। देश को इसकी सख्त जरूरत
है।
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शिखा कौशिक 'नूतन '
इस तथ्य से तो सब परिचित हैं ही कि फिल्मों में सफल होने के लिए कई अभिनेताओं-अभिनेत्रियों  ने हिन्दू नामों का सहरा लिया जैसे दिलीप कुमार [युसूफ ] अजीत ,
मधुबाला ,मीना कुमारी आदि पर वहां कारण अलग था .मुस्लिम समाज में फिल्मों को देखने पर कड़ी पाबन्दी थी इसलिए फिल्मों के दर्शक हिन्दू ही ज्यादा थे पर आज मुस्लिम
समाज में हिन्दू नाम रखने की  बढती प्रवर्ति उनमे असुरक्षा के भाव को दर्शाता है .क्यों भयभीत हैं हिंदुस्तान के मुस्लिम ? मैं एक हिन्दू के तौर पर कह सकती
हूँ कि हमारे मन में मुस्लिम समाज को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं .हिन्दू-मुस्लिम मिलकर ही हमारा भारतीय समाज पूरा होता है .हिंदुस्तान हिन्दुओं के साथ साथ मुस्लिमों
  का भी है .देश की  रक्षा व् विकास में दोनों सामान रूप से भागीदार हैं फिर किस बात का डर है हमारे मुस्लिम समाज को ?
जहाँ तक मैं मानती हूँ ये भय -ये डर पडोसी देश में बैठे कट्टरपंथी बाशिंदे हमारे मुस्लिम भाइयों के दिल में पैदा कर रहे हैं .वे न तो पाकिस्तान में हिन्दुओं
को सुकून से रहना देना चाहते  हैं और न हिंदुस्तान में मुसलमानों को .हमारे भारतीय मुस्लिम भाइयों को चाहिए कि वे इनके बहकावे में न आये .हिंदुस्तान मुस्लिमों
के लिए सबसे सुरक्षित मुल्क है और रहेगा क्योंकि यहाँ हम न हिन्दू हैं ...न मुस्लिम हैं ...हम केवल भारतीय हैं .
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Vandana Singh 
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किसी परीक्षा से गुजरने की
और उनसे हार जाने की तो
बिलकुल  भी नही !
मैंने आसान समझा था
हर रस्म हर रिवाजों से
बगावत कर .. मीरा हो जाना
मगर मेरे पास नही था वो यकीन
जो जहर के प्यालों को
अमरित करता
हर विकल्प को हारकर
मैं बची हूँ वही आम लड़की
जिसके हिस्से में दोराहे नही होते 
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Jyoti Dehliwal 
जब हम किसी व्यक्ति को क्षमा करते है, तो मन को उसके लिए निरंतर चलने वाली नकारात्मक भावनाओं के बोझ से मुक्त करते है। फिर क्रोध, शिकायत आदि पर खर्च कि जाने
वाली उर्जा का इस्तेमाल जीवन को बेहतर बनाने के लिए कर सकते है।
क्षमा एक ऐसी औषधी है, जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। क्षमा न करने से महत्वपुर्ण हार्मोन का बनना बंद हो जाता है। संक्रमण और अन्य शारीरिक बिमारिओं
जैसे मौसमी सर्दी, जुकाम आदि बिमारिओं से लडनेवाली कोशिकाओ को भी बाधा पहुंचती है।
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 Vivek Surange 
 कुरुक्षेत्र युद्ध के 16वें दिन यह कहा गया था कि सातों ग्रह, सूर्य से दूर जा रहे हैं, चूंकि राहु और केतु जिनके पास शरीर नहीं सिर्फ परछाई है, को नजरअंदाज
किया जा सकता है
आज बस इतना ही...
धन्यवाद।

Sunday, November 29, 2015

"मैला हुआ है आवरण" (चर्चा-अंक 2175)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गीत 

"मैला हुआ है आवरण"

सभ्यताशालीनता के गाँव में
खो गया जाने कहाँ है आचरण
कर्णधारों की कुटिलता देखकर
देश का दूषित हुआ वातावरण... 
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क्षणिकाएं 

कुछ दर्दकुछ अश्क़,

धुआं सुलगते अरमानों का

ठंडी निश्वास धधकते अंतस की,

तेरे नाम के साथ
छत की कड़ियों की
अंत हीन गिनती,

बन कर रह गयी ज़िंदगी

एक अधूरी पेन्टिंग

एक धुंधले कैनवास पर... 
Kailash Sharma 
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कोशिश 

यह सच है कि धरती और आसमान 
एक दूसरे से मिल नहीं सकते, 
पर मिलने की कोशिश तो कर सकते हैं... 
कविताएँ पर Onkar 
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माना कि साथ चलते हैं.. 

कुछ लोग हम राह बन कर 
पर अपने ठौर तक 
अकेले ही जाना होता है... 
जो मेरा मन कहे पर Yashwant Yash 
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पहला प्यार 

वक्त बदला, तारीखें बदली 
ना बदला वो एहसास व प्यार !! ......  
बस 11 साल ही तो हुए उस दिन को, 
जब हम बँधे थे इक बंधन में... 
शब्द-शिखर पर Akanksha Yadav 
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इक ख्याल दिल में समाया है 

मुद्दत से इक ख्याल दिल में समाया है 
धरती से दूर आसमां में घर बनाया है... 
यूं ही कभी पर राजीव कुमार झा 
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ट्रक और लॉरी में फर्क होता है 

 ....दोनों करीब-करीब एक जैसे होते हैं पर फिर भी उनके काम में फर्क तो है ही। ये फर्क मुझे भी तब पता चला जब अपने सामान की शिफ्टिंग के लिए मैंने एक ट्रांसपोर्टर की सेवाएं लीं। बातों-बातों में उन्होंने यह जानकारी मुझे दी तो मैंने भी उसे शेयर कर लिया... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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हाइकू____||| 

जीवन पथ
उचित अनुचित
मैं हूँ विक्षिप्त

रुग्ण हृदय
शोकाकुल है देह
स्मरण तुम... 
♥कुछ शब्‍द♥ पर Nibha choudhary 

बैठे ठाले - १५ 

मित्रो! दिल पर हाथ रख कर बोलिए, क्या आज देश में धार्मिक असहिष्णुता फ़ैली हुई नहीं है? सत्तानशीं लोग कहते हैं कि ये काग्रेसियों की साजिश मात्र है, बदनाम करने की मुहिम है, पर यह पूरा सच नहीं है. मैं हल्द्वानी शहर से सटे हुए एक आधुनिक गाँव में निवास कर रहा हूँ, जहाँ 99.9% आबादी हिन्दू है. अधिकाँश बुजुर्ग सरकारी या गैरसरकारी सेवाओं से रिटायर्ड हैं, जहां कहीं भी उठते बैठते या साथ घूमते हैं तो देश की सियासत पर चर्चा होने लगती है. समाचार चैनल्स की ख़बरों पर तप्सरा होने लगता है. केंद्र की पिछली सरकार में हुए घोटालों को भाजपा ने अपने लोकसभा चुनावों में खूब भुनाया अत: अधिकांश लोग परिवर्तन चाहते थे... 
जाले पर पुरुषोत्तम पाण्डेय 
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भारत में असहिष्णुता है . 

संविधान दिवस और धर्मनिरपेक्षता और असहिष्णुता पर संग्राम ये है आज की राजनीति का परिपक्व स्वरुप जो हर मौके को अपने लिए लाभ के सौदे में तब्दील कर लेता है .माननीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस मौके पर संविधान निर्माता के मन की बात बताते हैं वैसे भी इस सरकार के मुखिया ही जब मन की बात करते फिरते हैं तब तो इसके प्रत्येक सदस्य के लिए मन की बात करना जरूरी हो जाता है... 
! कौशल ! पर Shalini Kaushik  
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भारत असहिष्णु राष्ट्र नहीं है 

इन दिनों भारत में तथाकथित असहिष्णुता का माहौल बनाया जा रहा है। असहिष्णुता की विधिवत पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। साहित्यकारों का पुरस्कार लौटना, अभिनेताओं के बड़बोले और ऐसे बयान जिसे सुनकर हर भारतीय की आत्मा आहत होती है, धार्मिक प्रतिनिधियों के ऐसे वक्तव्य जिसे सुनकर लगता है कि भारत इतना असहिष्णु हो गया है कि पाकिस्तान भी सहिष्णु राष्ट्र लगने लगा है। भारत की असहिष्णुता साबित करने के लिए लोग युद्ध स्तर से इसी काम में लग गए हैं। असहिष्णुता का बीज बोया जा रहा है। भारत को असहिष्णु राष्ट्र घोषित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम चलाया जा रहा है... 
वंदे मातरम् पर abhishek shukla 
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विश्व में बस एक है 

जड़ता-कटुता-हिंसा ने
सभ्यता को पंक बना दिया
मिट्टी के पुतले बनकर
मानवता को मुरझा दिया.
विद्वेष घृणा से लड़नेवाले
अनुरागहीन अनासक्त हुआ
भूलोक का गौरव मनोहर
देख कर भी न आसक्त हुआ... 
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याद आती है बेचैन हरिक साज़ की सूरत
वो शाम कयामत की, जले ताज़ की सूरत

थी भीड़ मजारों पर, चिताएँ भी थीं रौशन
आबाद अभी दिल में है जाबांज़ की सूरत... 
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इच्छा

कोई हमको

कभी क्यूं

नहीं बनाता

अपना दलाल
कब से कोशिश
कर रहे हैं
लग गये हैं
कई साल... 
उलूक टाइम्स
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अर्थ पहचानती रही 
तासीर ही गर्म इतनी रही 
लहू ठंडा हो गया 
बिना दवा लिए हुए ... 
निविया पर Neelima Sharma 
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Saturday, November 28, 2015

"ये धरा राम का धाम है" (चर्चा-अंक 2174)

मित्रों!
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रम रहा सब जगह राम है।
ये धरा राम का धाम है।।

सच्चा-सच्चा लगे,
सबसे अच्छा लगे,
कितना प्यारा प्रभू नाम है।
ये धरा राम का धाम है
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अफ़सोस की बात है आश्चर्य की नहीं संविधान दिवस पर संविधान निर्मातों के अवदान की चर्चा होनी चाहिए थी लेकिन धूर्त कांग्रेस ने ने उसे भी आत्मश्लाघा और बीजेपी की निंदा में तब्दील करके रस लिया। मंथरा पूरे आवेग के साथ खिलखिलाई मुस्काई जैसे इस सबका श्रेय भी उसका निजी योगदान रहा आया हो।पहली बार मंथरा इतना खुश देखीं गईं । 

Virendra Kumar Sharma 
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दोस्ती साईकिल से ६:  

ऊँचे नीचे रास्ते 

और मन्ज़िल तेरी दूर. . . 

Niranjan Welankar 
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डा रंगनाथ मिश्र सत्य के हाइकू.... 

मैं जानता हूँ
तुम्हारी हर चाल
पहचानता हूँ |

कहता नहीं
लेकिन कहना भी
नहीं चाहता... 
shyam Gupta  
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कबाड़ -  

कविता 

*(शब्द और चित्र: अनुराग शर्मा) * 
यादों का कबाड़ कचरा ढोते रहे 
दुखित रोते रहे 
कबाड़ के ढेर में 
खुद को खोते रहे 
तेल जलता रहा 
लौ पर न जली था 
अंधेरा घना 
जुगनू सोते रहे 
शाम जाती रही 
दिन बदलते रहे 
बौर की चाह में 
खत्म होते रहे 
Smart Indian 
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रोटी बेटी 

rotii के लिए चित्र परिणाम
रोटी ताती चाहिए ,ठंडी नहीं सुहाय |
नखरे क्यूं  करता भला ,बात समझ ना आय ||
बात समझ ना आय ,अरे तू कैसा मूरख |
खाले अब चुपचाप ,उतारी है क्यूं सूरत... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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मसला पूरी ग़ज़ल का था 

मिसरे पर ही अटक गए 
नाजुक रिश्ते... 
चांदनी रात पर रजनी मल्होत्रा नैय्यर 
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ये राजनीतिक कटरपंथी हैं 

अब नहीं होते चौराहों पर पंगे 
न धर्म के नाम पे हिन्दू मुस्लिम के दंगे। 
न सुनाई देता है मंदिर मस्जिद का शोर 
अमन है अब चारों ओर। 
थम जाएगा भ्रष्टाचार भी 
चल रही है लाठी कड़े कानून की। 
पर खतरा है अभी लोकतंत्र पे, 
कटरपंथियों की विचार धारा से... 
मन का मंथन  पर kuldeep thakur 
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आज पुरानी डायरी में 

बेशुमार प्यार पढ़ा …… 

बीते लम्हों मे भरा एतबार पढ़ा  
हँसी और आंसुओं का सैलाब पढ़ा 
आज पुरानी डायरी मे 
बेशुमार प्यार पढ़ा … 
प्यार पर Rewa tibrewal 
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जासूस 

जासूस कब किस रूप में 
क्या बन कर सामने आ जाए 
नहीं पता होता किसी को। 
पता तो तब चलता है 
जब पंछी फँसता है जाल में 
और कैद हो जाता है 
किसी पिंजरे में... 
जो मेरा मन कहे पर Yashwant Yash 
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असहिष्णुता तो दिल्ली की सडकों पर भी है 

लेकिन बचकर कहाँ जाएँ हम ---

आजकल स्मार्ट फोन के साथ कारें भी स्मार्ट आ गई हैं। यदि आप घर से बिना सीट बैल्ट लगाये ही निकल पड़े तो आपकी गाड़ी टें टें करके आपके कान खा लेगी जब तक कि आप सीट बैल्ट लगा नहीं लेते। इसी तरह दरवाज़ा खुला होने पर भी आपको सूचित कर देगी। पैट्रोल कम होने पर वह आपको यह भी बता देगी कि आप कितनी दूर और जा सकते हैं। इसके अलावा सुख सुविधा के सभी साधन तो गाड़ी में होते ही हैं। लेकिन दिल्ली जैसे शहर की सडकों पर चलते हुए आपको ट्रैफिक स्मार्ट नहीं मिलेगा। बल्कि इतना अनुशासनहीन मिलेगा कि यदि आप स्वयं गाड़ी चला रहे हैं तो आपका ब्लड प्रेशर बढ़ना निश्चित है... 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल 
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रामनामी ओढ़कर, 

बधिक मत बने 

भारतीय संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बड़े गर्व से कहा कि संविधान में 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द का सबसे ज्यादा दुरूपयोग हुआ है इस शब्द के दुरूपयोग को रोका जाए कहीं न कहीं उनके मन कि कसक छलक आयी आजादी की लड़ाई के लि नौजवानों को रोकने का प्रयास किया था और कहा था कि हिन्दुत्व मुख्य चीज है और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को पेश किया था ब्रिटिश-साम्राज्यवाद से हिन्दुत्ववादी शक्तियों को कोई दिक्कत नहीं थी। ‘सेकुलरिज्म’ संविधान की प्रस्तावना में ही निहित है जिसका आशय यह है कि ‘देश का कोई धर्म नहीं है... 
Randhir Singh Suman 
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संस्मरण  

"उपहार" 

पहाड़ में मामा-मामी उपहार में मिले

   यह बात 1966 की है। उन दिनों मैं कक्षा 11 में पढ़ रहा था। परीक्षा हो गईं थी और पूरे जून महीने की छुट्टी पड़ गई थी। इसलिए सोचा कि कहीं घूम आया जाए। तभी संयोगवश् मेरे मामा जी हमारे घर आ गये। वो उन दिनों जिला पिथौरागढ़ में ठेकेदारी करते थे। उन दिनों मोटरमार्ग तो थे ही नहीं इसलिए पहाड़ों के दुर्गम स्थानों पर सामान पहुँचाने का एक मात्र साधन खच्चर ही थे... 
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