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Wednesday, December 31, 2014

कलाकार, गृह-स्वामिनी, मान चाहते सर्व: चर्चा मंच 1844



रविकर 
"कुछ कहना है" 
चढ़े सफलता शीश पे, करे साधु भी गर्व। कलाकार, गृह-स्वामिनी, मान चाहते सर्व। 
मान चाहते सर्व, नहीं अपमान सह सके । कलाकार तब मौन, साधु से गुस्सा टपके । 
सबका अपना ढंग, किन्तु गृहिणी का खलता। रो लेती चुपचाप, कहाँ कब चढ़े सफलता। 

देवेन्द्र पाण्डेय 
एक तमाशा मेरे आगे 
गगन शर्मा, कुछ अलग सा 


Tuesday, December 30, 2014

"रात बीता हुआ सवेरा है" (चर्चा अंक-1843)

मित्रों।
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए कुछ लिंक।
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रात बीता हुआ सवेरा है 

जब जागो तभी सवेरा है
रौशनी आती मिटता अँधेरा है
दरख्तों से छन कर आती रही 
हर तरफ खुशबुओं का डेरा है... 
यूं ही कभी पर राजीव कुमार झा 
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"कैसे मन को सुमन करूँ मैं?" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक) 

सब कुछ वही पुराना सा है!
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?

कभी चाँदनी-कभी अँधेरा,
लगा रहे सब अपना फेरा,
जग झंझावातों का डेरा,
असुरों ने मन्दिर को घेरा,
देवालय में भीतर जाकर,
कैसे अपना भजन करूँ मैं?
कैसे नूतन सृजन करूँ मैं?
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गहरा कुहासा ... 

यूं ज़ुबां फिसली तमाशा हो गया 
हर हक़ीक़त का ख़ुलासा हो गया 
बाम पर आकर खड़े वो क्या हुए 
चांद का चेहरा ज़रा-सा हो गया... 
Suresh Swapnil 
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एक पत्रकार का अपहरण- 

आपबीती)-1 

पुरानी यादें / नए मित्रों के लिए ... 

पुरानी यादें 30 दिसम्बर 2005 की वह काली शाम जब भी याद आती है मन सिहर जाता है। उस रात बार बार मौत ऐसे मुलाकात करके गई मानों रूठी हुई प्रेमिका को आगोश में लेने का प्रयास कोई करे और वह बार बार रूठ जाए... 
चौथाखंभापरARUN SATHI 
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"गीत-फिर से चमकेगा गगन-भाल" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

फिर से चमकेगा गगन-भाल।
आने वाला है नया साल।।

आशाएँ सरसती हैं मन में,
खुशियाँ बरसेंगी आँगन में,
सुधरेंगें बिगड़े हुए हाल।
आने वाला है नया साल।।
होंगी सब दूर विफलताएँ,
आयेंगी नई सफलताएँ,
जन्मेंगे फिर से पाल-बाल।
आने वाला है नया साल... 
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''क्योंकि वो एक लड़की है '' 

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भारतीय नारी पर shikha kaushik 
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घर याद आता है मुझे 

मेरा फोटो
वंदे मातरम् पर abhishek shukla
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फिसलते हुऐ पुराने साल का 

हाथ छोड़ा जाता नहीं है 

उलूक टाइम्सपरसुशील कुमार जोशी 
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कभी कभी यूं ही बहते जाते शब्द 

१.
मन सा आकाश
उड़ान परिंदों की उदास
सघन तारों के बीच 
चाँद फिर भी तन्हा
एकांकी से भरा  
असंख्य प्रकाश वर्ष की दूरी पर
जिन्दगी पानी पर बहती जाती !
२.... 
हमसफ़र शब्द पर संध्या आर्य 
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कुछ फेसबुकिया पोस्ट 

माँ...
बदल दिये मैंने घर के पुराने फर्नीचर
सिर्फ रख लिया है वह ड्रेसिंग टेबल
जहाँ तुम अपनी बिंदियाँ चिपका दिया करती थी
ऋता*
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु
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ओ दिसम्बर! 

...अभी नहीं आया नववर्ष! 
ओ दिसम्बर! 
तू उदास मत हो 
तू ही तो है जिसके आने पर 
धरती के मन में 
नई जनवरी खिलने लगती है।
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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बूँद बन नैनो से मैने 

गिरा दिया अब तुम्हे

खो गई दूर कहीं कल्पनायें मेरी 
धुंधला गई अब यादें तेरी... 
Rekha Joshi
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हायकू 

गांव की बाला
नहीं है  मज़बूर
थामे पुस्तक... 
नयी उड़ान + पर Upasna Siag
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Deewan 47 Nazm 

Junbishen पर Munkir
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चलो! सुलह कर लेते हैं !! 

लौटता नहीं वक़्त जाने के बाद कभी
जो अपने पास है वो लम्हा संवार लेते हैं
कसमे-वादो की गर्म हवा से
सपनो की वादियों में 
फिर से फूल खिला देते हैं  
चलो! सुलह कर लेते हैं !!
Lekhika 'Pari M Shlok' 
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प्रशासन 

सर्दियों की कुनकुनी धूप का आनन्द लेने मैं छत पर पहुंची तो पास की छतों पर बच्चे पतंग उड़ाने में व्यस्त थे कुछ दूर से किसी चुनावी सभा की धीमी-धीमी सी आवाज आ रही थी वहीँ चटाई पर अपने क़ागज फैलाये बिटिया मिनी नशा-मुक्ति सम्बन्धी पोस्टर तैयार करने में लगी थी | पोस्टर कुछ इस तरह उभर रहा था –सिगरेट के चित्र के पास मानव कंकाल ... सिगरेट रूप में बनी अर्थी ..शराब की बोतल के पास स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतावनी और आस-पास कुछ समाचारपत्रों की कतरनें .. 
My Photo
Vandana Ramasingh 
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डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति का जन्‍म 

29 दिसम्‍बर को हुआ था 

29 दिसम्‍बर 1929 को जन्‍मे मेरे पिताश्री डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति जी का जन्‍म हुआ था। 6 मई 1970 को उनका साया मेरे से उठ गया। वह विद्धान हिंदी लेखक, शिक्षाविद अौर सैन्‍ट्रल बोर्ड ऑफ हॉयर एजूकेशन तथा हिन्‍दी विद्यापीठ के संस्‍थापक एवं कुलपति थे। एक स्‍कूटर दुर्घटना में उनका निधन हुआ था। अंतिम समय पर उन्‍होंने मुझे मिलने पर स्‍मृति लोप एवं संज्ञा शून्‍य होने पर तेताला नाम से संबोधित किया था... 
पिताजी पर नुक्‍कड़ 

Monday, December 29, 2014

"साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज" (चर्चा अंक-1842)

मित्रों।
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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यूँ सजे हैं... 

हर वर्ष की भांति २०१४ भी अपने बीतने की प्रतीक्षा कर रहा है और २०१५ आने की ! आशा है यह वर्ष ब्लॉग जगत में नए उत्साह और जोश का संचार करे और वह पुराने रूप में वापस लौटे! जो जाने -माने ब्लोग्स अब शांत हैं वहाँ फिर से चहल-पहल शुरू हो. *नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ!.. 
व्योम के पार पर Alpana Verma -
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ख़ामोशी 

किसी ने मुझसे कहा क्यों खामोश है इतना भुप्पी
अब तोड़ भी दे अपनी चुप्पी
मैंने कहा लोकतंत्र की हत्या देख रहा हूँ
उसके पुनर्जन्म की बाट जोह रहा हूँ
क्या गीता में श्रीकृष्ण की बात झूठी हो गई
अधर्म ही यहाँ रीति हो गई
खामोश हूँ मुझे खामोश ही रहने दो... 
Bhoopendra Jaysawal 
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बे~वजह प्यार.. 

तुम कहते हो 
"तुम्हें प्यार करता हूं.. बेवजह, 
प्यार करने के लिए 
क्या वजह होना ज़रूरी है... 
parul chandra 
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जन्नत से  इक परी   मेरे घर   में उतर आई है 
मेरे  दिल  के   दरीचे  में  बज  रही  शहनाई  है 

महताब   सा  चेहरा  है    होठों  पे  तबस्सुम 
दिल  के   सहन   पे  खुशिओं की सहर आई है   
मैं तो नानी बन गयी... 
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गिरहकट 

कितने धीमे से काटते हो गिरह 
मालूम चलने का सवाल कहाँ चतुराई 
यही है और बेहोशी का दंड तो 
भोगना ही होता है होश आने तक 
ढल चुकी साँझ को कौन ओढ़ाए 
अब घूंघट... 
vandana gupta 
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मेहसाना पोलिस व् प्रधानमंत्री मोदी 

प्रशंसा के हक़दार 

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  भारत वर्ष में सत्ता सभी ओर हावी है किन्तु कानून आज भी सत्ता से ऊपर है और ये दिखाई दिया है एक बार फिर जब मेहसाना पोलिस ने प्रधानमंत्री की पत्नी जशोदा बेन द्वारा मांगी गयी जानकारी को इसलिए देने से मना कर दिया कि यह जानकारी स्थानीय अन्वेषण ब्यूरो से सम्बंधित है और यह सूचना के अधिकार अधिनियम में छूट प्राप्त है... 
! कौशल ! पर Shalini Kaushik 
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आस और विश्वास 

पुष्पा मेहरा 
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 चारों ओर निस्तब्धता छाई है,रोशनी की छींटें लिये वाहन ठिठकते बढ़े जा रहे  हैं । मरकरी लाइट सिकुड़ी पड़ी  अँधेरा हरने में असमर्थ हैपरिंदे भी दुबके पड़े दूर-दूर तक  दिखाई नहीं देतेरेत की आँधी सा घना अंधकार बिखेरता कोहरा धीरे-धीरे नीचे  उतरने लगा। यह लो! टप-टप-टप करते उसके कण नीचे बिछने लगेवे तो बिछते ही जा रहे हैंधरती भीगती जा रही हैनम हो रहा है उसका हृदयाकाश ।
         एक मात्र धरती ही तो है जिसका अंतस पीड़ा व सुख समाने की शक्ति रखता है। चारों ओर मौन मुखर होने लगाउसने कुहासे के सिहरते क्रंदन को सुनापल भी न लगा,शीत से काँपते हाथों से अपना आँचल फैला उसे सहेज लिया।कोहरा झड़ता रहा,धरा के वक्ष में समाता रहा।
 ममता की पराकाष्ठा ही तो व्याप रही थी सर्वत्र...! 
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"नवगीत-राह को बुहार लो" 

झाड़ुएँ सवाँर लो।
राह को बुहार लो।।

वक्त आज आ गया
“रूप” आज भा गया
आदमी सुवास की
राह आज पा गया
लक्ष्य को पुकार लो।
झाड़ुएँ सवाँर लो... 

"लाचार हुआ सारा समाज" (चर्चा अंक-2820)

मित्रों! रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...