चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Wednesday, September 04, 2013

गुरु हो अर्जुन सरिस, अन्यथा बन जा छक्का -चर्चा मंच 1359


नाजुक अंगों को छुवे, करे वासना शान्त |
बने कान्त एकांत में, होय क्वारपन क्लांत |

होय क्वारपन क्लांत, बुद्धि से संत अपाहिज |
बढे दरिन्दे घोर, हुआ अब भारत आजिज |

बड़ी सजा की मांग, सुरक्षा से है तालुक |
मात पिता जा जाग, परिस्थिति बेहद नाजुक |



गलती का पुतला मनुज, दनुज सरिस नहिं क्रूर |
मापदण्ड दुहरे मगर, व्यवहारिक भरपूर |

व्यवहारिक भरपूर, मुखौटे पर चालाकी |
रविकर मद में चूर, चाल चल जाय बला की |

करे स्वार्थ सब सिद्ध, उमरिया जस तस ढलती |
करता अब फ़रियाद, दाल लेकिन नहिं गलती ||




छक्का पंजा भूलता, जाएँ छक्के छूट |
छंद-मन्त्र छलछंद जब, कूट-कर्म से लूट |

कूट-कर्म से लूट, दुष्ट का फूटे भंडा |
पाये डंडा दण्ड, बदन हो जाये कंडा |

रविकर घटे प्रताप, कीर्ति को लगता धक्का |
गुरु हो अर्जुन सरिस, अन्यथा बन जा छक्का ||




ओसारे में बुद्धि-बल, मढ़िया में छल-दम्भ |
नहीं गाँव की खैर तब, पतन होय आरम्भ |

पतन होय आरम्भ, बुद्धि पर पड़ते ताले |
बल पर श्रद्धा-श्राप, लाज कर दिया हवाले |

तार-तार सम्बन्ध, धर्म- नैतिकता हारे |
हुआ बुद्धि-बल अन्ध, भजे रविकर ओसारे ||

Virendra Kumar Sharma 
ram ram bhai
 सत का निर्मल-ज्ञान फल, लोभ-क्षोभ रज मूल |
लापरवाही भ्रम भरे, रविकर तम का शूल ||

"दोहे-खुली ढोल की पोल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
साधू-सन्तों के यहाँ, क्यों हैं इतने ठाठ।
धन-दौलत बाबाओं की, निर्धन में दो बाँट।।

दुनियादारी छोड़कर, जब हो गये विरक्त।
फिर क्यों साधू हो रहे, भोगों में अनुरक्त।।

एक मीन कर देत है, गन्दा सारा ताल।
यहाँ कंकड़ों से भरी, अब तो पूरी दाल।।

मीडिया का अतिरेकी रवैया अपनाना क्या सही है !
पूरण खण्डेलवाल 
रेकी रेका रोचता, इसे पसन्द बवाल |
फैलाए उत्तेजना, और कमाए माल |
और कमाए माल, खबर खरभर कर देता |
करता कभी कमाल, कदाचित पैसे लेता |
दिखा रहा प्रत्यक्ष, करे जैसे यह नेकी |
छुपा जाय पर सत्य, मीडिया यह अतिरेकी ||
रेका=संदेह / शंका 

एक चिरैया को, फंदे में पकड़ न पाए, शाम हो गयी -सतीश सक्सेना

सतीश सक्सेना 
चंचा हिलता खेत में, रहे चिरैया दूर |
बिछे जाल में पर फँसे, कुछ तो गलत जरूर |

कुछ तो गलत जरूर, बताओ क्या मज़बूरी |
पग पग पलते क्रूर, नहीं क्यूँ उनको घूरी |

कर दे काया सुर्ख, शिकारी चला तमंचा-
दल का मुखिया मूर्ख, दुष्ट रविकर नहिं चंचा ||
चंचा=खेत में लगा पुतला




गरम चाय
अरुण चन्द्र रॉय 



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जागती आँखों से छुआ नही जाता - दिगम्बर नासवा

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जम कर रह गये हैं जो बादल!!.................दफैरून

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SANDEEP PANWAR 


भविष्यवाणी - कहानी [भाग 2]

Anurag Sharma 



सरिता भाटिया 




"मयंक का कोना" 
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07 सितम्बर को
शनिवार की चर्चा लगा देना रविकर जी!
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आसाराम बापू अपने संकट का निवारण करने के लिए 
यदि निर्मल दरबार में जाते तो वहां ऐसा कुछ होता

Hasya Kavi Albela Khatri

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ये देखो आज भरत से राम वध करा गयी

! कौशल !

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इखरे - बिखरे - निखरे आखर

झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव

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श्रीमदभगवत गीता चौदहवाँ अध्याय त्रिगुणत्रयविभाग योग :
भाव विस्तार श्लोक संख्या (१ -१७ )
आपका ब्लॉग
आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma

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वफ़ा के नाम से डरते हैं .....गमदीदा मोहब्बत के,वफ़ा के नाम से डरते हैं |
बेदर्द जमाने में  ,खत-ओ-पैगाम से डरते हैं...

प्रस्तुतकर्ता 
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"बढ़े चलो-बढ़े चलो"
काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"बढ़े चलो-बढ़े चलो"

कारवाँ गुजर रहा , रास्तों को नापकर।
मंजिलें बुला रहींबढ़े चलो-बढ़े चलो!
है कठिन बहुत डगरचलना देख-भालकर,
धूप चिलचिला रहीबढ़े चलो-बढ़े चलो!!
"धरा के रंग"
--

15 comments:

  1. आभार रविकर जी!
    --
    07-09-2013 शनिवार की भी चर्चा लगाने की कृपा करें।
    मुझे 6 और 9 सितम्बर को बाहर जाना है!
    --
    सूचनार्थ सादर!

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  2. शुभ प्रभाक रविकर भाई
    शानदार चर्चा....सच में अनछुई रचनाओं से अवगत करवाया आपने
    आभार,,,,दफैरून की रचनाएँ अक्सर कृत्या में प्रकाशित होते रहती है

    सादर

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  3. आदरणीय रविकर sir एवं गुरु जी प्रणाम
    बढ़िया सूत्रों से सुसज्जित चर्चा के लिए बधाई
    मेरी प्रेम की पाती को स्थान देने के लिए शुक्रिया

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  4. लखि सुबेष जग बंचक जेऊ ,बेश प्रताप पूजिअहिं तेऊ ,

    उघरहिं अंत न होइ निबाहू ,कालनेमि जिमि रावन राहू।

    जो (वेशधारी )ठग हैं ,उन्हें भी अच्छा (साधु -सा )वेश बनाए देखकर वेश के प्रताप से जगत पूजता है

    ;परन्तु एक -न -एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं ,उनकी अ - सलियत सामने आ जाती है। अंत तक

    उनका कपट नहीं निभता ,जैसे कालनेमि ,रावण और राहुका हाल हुआवैसे ही आशा राम बापू का हुआ

    है।

    "दोहे-खुली ढोल की पोल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
    रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
    उच्चारण

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  5. अच्छे सूत्र आज के चर्चा मंच पर रविकर जी |मेरा ब्लॉग शामिल करने के लिए आभार |
    आशा

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  6. आपनें बहुत सुन्दर चर्चा सजाई है !
    सादर आभार !!

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  7. रविकर की चर्चा में
    उसकी कुंडलियाँ भी
    होती हैं जब साथ
    अच्छे सूत्र में लग
    जाते है चार चांद
    आभारी हे उल्लूक
    उसका दीमक भी
    रहा है आज की चर्चा
    के पन्ने को चाट !

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  8. बेहद उम्दा चर्चा सजाई है.........मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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  9. मस्त है आज की हलचल ...

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  10. अच्छी चर्चा है.....
    ---हाँ मुझे लगता है कि हमारे लेखक, कविगण, ब्लोगर आदि इस ताक में बैठे रहते हैं कि कोई चटपटी घटना/ दुर्घटना घटे और उन्हें उस पर लिखने का अपनी काव्यप्रतिभा दिखाने का, टिप्पणियाँ पाने का मौक़ा मिले... और दनादन बढ़चढ़ कर कविता, आलेख बुराइयां पर ब्लोग्स लिखना प्रारम्भ होजाता है जिनमें समाधान की कोइ दिशा नहीं होती ...बस चटपटी कवितायें ...मेरा विचार है कि घटनाओं पर कवितायें, आलेख आदि समाचार परक रचनाओं पर व्यर्थ में अपनी प्रतिभा व्यर्थ करने की अपेक्षा ...वे न घटें इस पर लिखना चाहिए....

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    ---
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}
    तकनीक शिक्षा हब
    Tech Education HUB

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  12. आदरणीय रविकर भाई जी बहुत सुन्दर चर्चा हेतु बधाई आपको |

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  13. सुन्दर काव्यमयी चर्चा..

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