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Thursday, September 30, 2010

गुरूवासरीय चर्चा-----(चर्चा मंच-293)

आज जबकि न्यायपालिका की ओर से रामजन्मभूमी-बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय आने जा रहा है.सभी इंतजार में हैं फैसले की. क्या होगा फैसला,किस के पक्ष में जाएगा---मालूम नही.कोई नहीं जानता,लेकिन वो तो अब कुछ देर में सामने आ ही जाने वाला है.अब फैसला चाहे मन्दिर के पक्ष में जाए कि मस्जिद के पक्ष में.....लेकिन इस वास्तविकता को भी भला कब तक छिपाया जा सकता कि ये मामला आज सिर्फ मन्दिर-मस्जिद तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि वोट बैंकों की राजनीति के चलते,'हिन्दू-मुस्लिम शक्ति परीक्षण' के मुकाम तक पहुँचा दिया जा चुका है. यह किसी भी न्यायालय के वश की बात नहीं है कि वो इस समस्या का कोई सकारात्मक निराकरण कर सके.न्यायालय तो ज्यादा-से-ज्यादा सिर्फ यह फैसला दे सकता है कि मन्दिर को तोडकर मस्जिद बनाई गई थी,या नहीं.इसलिए इस भ्रान्ती में न रहना ठीक है,और न ही रखना कि न्यायालय इस विवाद को सुलझा सकते हैं.हिन्दू और मुस्लिम के बीच की तकरारों और दरारों का मामला कानून और न्यायालयों के द्वारा निबटारे का मामला नहीं है.
इतना हमें समय रहते समझ लेना चाहिए कि सच्चाईयों और वास्तविकताओं से मुँह चुराना या इन पर पर्दे तानना समस्या का कोई हल नहीं होता.दरअसल झगडा न तो रामजन्मभूमी का है और न ही बाबरी मस्जिद का....ये तो सिर्फ ऊपरी सतह मात्र है,जिसके नीचे हिन्दु-मुस्लिम शक्ति परीक्षण की मानसिकता के ज्वार बुदबुदा रहे हैं.आज एकमात्र जरूरत है तो सिर्फ इस मानसिकता को बदलने की......वर्ना तो अभी आगे चलकर ओर न जाने कौन कौन से मन्दिरों और मस्जिदों के विवाद सामने आने बाकी है.....
बहरहाल,अब शुरू करते हैं आज की ये चर्चा…..जिसमें आप लोगों के सामने प्रस्तुत हैं—कुछ चुनिन्दा ब्लाग पोस्टस के लिंक्स……जिसमें नया-पुराना, अनगढ-सुघड, अटपटा और चटपटा सभी कुछ आप के सामने रख दिया गया हैं. आप लोग पढिए, आनन्द लीजिए और मन करे तो टिप्पणी कीजिए, न मन करे तो भी कोई बात नहीं, आखिर कोई जोर जबरदस्ती थोडे ही है :) 

हिन्दी की हिन्दी अंग्रेज़ी की अंग्रेज़ी

—चौं रे चम्पू! हिन्दी पखवारे में हिन्दी की कित्ती हिन्दी करी तैनैं?
—चचा मज़ाक मत बनाओ। हिन्दी की हिन्दी से क्या मतलब है? माना कि आजकल अंग्रेज़ी की अंग्रेज़ी हो रही है, लेकिन अंग्रेज़ी की हिन्दी भी हो रही है और हिन्दी की अंग्रेज़ी भी हो रही है। कम्प्यूटर ने भाषाओं के विकास के रास्ते खोल दिए हैं। किसी नीची निगाह से न देखना हिन्दी को!
—तौ का हिन्दी को स्वर्ण काल आय गयौ?
—व्यंग्य मत करो चचा! सब कुछ तो जानते हो। लेकिन मान जाओ कि स्वर्ण काल भले ही न आया हो पर यदि हम चाहें तो हिन्दी का भविष्य स्वर्णिम बना सकते हैं.

तोताराम और सरकारी नाक

image पहले राजा लोग नाक के लिए लड़ते थे। कभी अपनी नाक बचाने के लिए तो कभी दूसरे की नाक काटने के लिए। इस चक्कर में ज़्यादातर दोनों की ही नाक कट जाती थी। मुगलों के आने के बाद अधिकतर राजाओं ने तो अपनी नाक बचाने के लिए उसे छोटा करवा लिया। महाराणा प्रताप, शिवाजी, छत्रसाल, दुर्गादास, और अमर सिंह जैसों ने अपनी नाक के लिए सर कटवाना ज्यादा ठीक समझा। इसके बाद जब अंग्रेज़ आए तो सभी राजाओं और नवाबों ने अपनी नाक को सुरक्षित रखने के लिए उसे अंग्रेजों के पास ही जमा करवा दिया। जब अपने दरबार में जाना होता या अपनी प्रजा पर रोब ज़माना होता तो लॉकर में से निकल कर ले आते थे और काम करने के बाद फिर लॉकर में जमा कर आते थे।

काम के ना काज के दुश्मन अनाज के

भूखों का एक डेलीगेशन खाद्य मंत्री से मिलने गया। पहले तो खाद्य मंत्री ने यह सोचकर कि-‘‘भुख्खड़ साले आ गए मुफ्त में गेहूँ माँगने’’, मिलने से साफ इन्कार कर दिया, फिर जब दलालों ने समझाया कि वे गेहूँ माँगने नहीं आएँ हैं,बल्कि अब तक सड़े और भविष्य में सड़ने वाले गेहूँ के बारे में सार्थक चर्चा करने आएँ हैं,तब जाकर खाद्य मंत्री डेलीगेशन से मिलने के लिए राज़ी हुए

नारा ही देश को महान बनाता है..

सत्तर और अस्सी के दशक के सरकारी नारों को पढ़कर बड़े हुए। उस समय समझ कम थी। अब याद आता है तो बातें थोड़ी-थोड़ी समझ में आती हैं। ट्रक, बस, रेलवे स्टेशन और स्कूल की दीवारों पर लिखा गया नारा,'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' सबसे ज्यादा दिखाई देता था। भविष्य में इतिहासकार जब इस नारे के बारे में खोज करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि 'एक समय ऐसा भी आया था जब अचानक पूरे देश में अनुशासन की कमी पड़ गई थी। अब गेंहूँ की कमी होती तो अमेरिका से गेहूं का आयात कर लेते (सोवियत रूस के मना करने के बावजूद), जैसा कि पहले से होता आया था। लेकिन अनुशासन कोई गेहूं तो है नहीं।'इतिहासकार जब इस बात की खोज करेंगे कि अनुशासन की पुनर्स्थापना कैसे की गई तो शायद कुछ ऐसी रिपोर्ट आये:-----

बोलो जी अब तुम क्या खाओगे

image ज़माना बेशक आज बहुत आगे बढ़ चूका हो,मगर स्त्रियों के बारे में पुरुषों के द्वारा कुछ जुमले आज भी बेहद प्रचलित हैं,जिनमें से एक है स्त्रियों की बुद्धि उसके घुटने में होना...”क्या तुम्हारी बुद्धि घुटने में है”ऐसी बातें आज भी हम आये दिन,बल्कि रोज ही सुनते हैं....और स्त्रियाँ भी इसे सुनती हुई ऐसी "जुमला-प्रूफ"हो गयीं हैं कि उन्हें जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता इस जुमले से..
अनेकानेक बाधाओं से मुक्ति मात्र सिर्फ एक उपाय से........
कर्म करना एक तरह से मानव जीवन की विवशता ही है,क्यों कि किए गए कर्मों से ही प्रारब्ध का निर्माण होता है.भाग्य पूर्व के संचित कर्मों तथा वर्तमान जीवन के किए गए कर्मों के मिश्रण का ही रहस्यमयी अंश है.इसलिए अधिकतर लोग अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के चरम को छूने के लिए निरन्तर संघर्षशील रहते हैं,लेकिन इनमें से बहुत कम ही अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं, क्यों कि प्रकृ्ति केवल योग्य "प्रारब्ध" का ही स्वागत करती है

सहिष्णुता की समृद्ध परंपरा रही है भारत में

कल दोपहर साढ़े तीन बजे अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो जायेगा,कम से कोर्ट के स्तर पर तो यह मामला निपट जायेगा। सरकार ने इस मुद्दे पर विभिन्न संगठनों से शांति की अपील की है। भारत की जनता सहिष्णु है और सभी दूसरे मतावलंबियों की धार्मिक आस्था का भी आदर रखती है इसके बावजूद आवेश के क्षणों में गलतियां भी हो सकती हैं। अयोध्या पर चाहे जो फैसला आये,इस पर हमारी प्रतिक्रिया भारत की गौरवशाली सामासिक संस्कृति के दायरे में होनी चाहिये।

भरोसे की ताकत

जिस तरह शरीर अस्थियों के जोड़ द्वारा परिचालन योग्य बनता है, उसी प्रकार जीवन में भरोसे का जोड़ महत्वपूर्ण है। यदि यह जोड़ न हो तो शरीर बेकार ही रहेगा,उसमें गति नहीं होगी। यदि भरोसा न रह जाए तो जीवन बिल्कुल शून्य की भांति खोखला एवं उदासीन होगा। भरोसा जीवन की आशा-ज्योति है जो विश्वास तक पहुंचती है। कहा जा सकता है कि आशा और विश्वास का मध्यांतर है भरोसा।

वतन है...हिंदोस्तां हमारा!

image सीटी बजते ही हम प्रेशर-कुकर नहीं खोल लेते हैं। सीटी के नीचे से थोड़ी-थोड़ी भाप निकाल कर उसे ठंडा करते हैं और फिर ढक्कन खोलते हैं। अयोध्या का फैसला यकायक आ जाने से कुछ भी हो सकता था। इसलिए कि तब तक हम तय कर पाने की हालत में ही नहीं होते कि इस फैसले पर किस तरह खुश या दु:खी होना है...होना भी है या नहीं। आज भी आमजन तो इसी पशोपेश में रहता है और उसका बेजा फायदा जहरीले दिमाग उठा लेते हैं।

नज़रे बदल गई या मोसम बदल गए

आजकल मोसम कुछ बदला बदला सा लग रहा हे गर्मी ख़तम हो रही हे,पर आजकल फिज़ाओ में अजीब सी घुटन फ़ैल रही हे सब के मन में डर है कल पता नहीं क्या हो जाये कोई नहीं चाहता की किसी भी तरह से देश की शांति भंग हो फिर क्यों मोसम इतना नीरस हे आखिर अचानक क्या हो गया की सदा एक दुसरे का हाथ पकड़ कर चलने वाले लोग भी एक दुसरे को देखकर नज़रे फेर रहे है। अचानक धर्म दोस्ती से बड़ा कैसे हो गया। क्या इतने सालो की वो मेल मुलाक़ात दिखावा थी क्या सरे सुख दुःख जो साथ में बांटे वो दिखावा था। वो चाय की दूकान में एक ही कप से चाय पीना वो साथ में घूमना वो बाते सब दिखावा था

परछाईयों के देश से....

कभी कभी लगता है कि हम एक दूसरे से नहीं वरन एक दूसरे के "आईडिया"से ज्यादा प्यार करते है जिन्हें हम सब में मौजूद कल्पना और सृजनशीलता साथ मिलकर अनूठे रंगो से सजा हमारे सम्मुख परोस देती है किसी स्वादिष्ट छप्पन भोग सा,जिसका स्वाद यथार्थ से साक्षात्कार के बावजूद मन के किसी कोने में शेष रहता है किसी "नास्टेल्जिया"की तरह. जहां किसी तरह के "कन्फ़लिक्ट"की गुंजाईश ही नहीं जहां अपने उन "आईडियाज"को अपने मन मुताबिक " चेंज" "अरेंज" या "री अरेंज" करने की बेहिच् आजादी है.

किस्सा नखलऊवा का…

image नखलऊवा की कहानी में मैंने अपनी ओर से कोई मिलावट नहीं की है.ये ऐसे ही मिली थी मुझे मय नमक-मिर्च और बैसवारे के आमों से बने अमचूर पड़े अचार की तरह,चटपटी और जायकेदार.इसका महत्त्व इस बात में नहीं कि ये बनी कैसे?इस बात में है कि हमारे सामने परोसी कैसे गयी? ये कहानी सच्ची है.उतनी ही सच्ची जितनी कि ये बात कि लखनऊ के गाँवों में बहुत से लोग अब भी उसे ‘नखलऊ’ कहते हैं

हम सांप से ज्यादा जहरीले हो गए हैं

image स्वार्थ के दांत कितने नुकीले हो गए हैं
हम सांप से ज्यादा जहरीले हो गए हैं।
हर कोई समझने में करने लगा है भूल-
क्योंकि हमारे आवरण चमकीले हो गए हैं।
वह तो उगलता है जहर डंसने के बाद -
हम उगल-उगलकर जहर पीले हो गए हैं।

विस्मय

image सृष्टि की जननी बनकर
है सृष्टा का भेस धरा
वृहत वसुंधरा से बढ़कर
रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा ।
माँ कहलाई महिमा पाई
ममता दुलार लुटाती हो
देवों ने भी स्तुति गाई
हर रिश्ते से गुरुतर हो ।

तुझे समझना सरल नहीं है

image रहता नयनों का भाव,
एकसा सदा,
ना होता परिवर्तन मुस्कान में,
और ना कोई हलचल,
भाव भंगिमा में,
लगती है ऐसी,
जैसे हो मूरत एलोरा की

पदार्थ की पूजा ....

पदार्थ की पूजा करके, थके पछताते-से हैं लोग.
विज्ञान की राह में भटके, शरमाते-से हैं लोग.
साथ कोई है नहीं, सब जी रहे हैं जुदा-जुदा !
टूटकर बिखरे हुये, मनकों के दाने-से हैं लोग.
भावनाओं-से रहित, लोग जैसे हैं मशीन !
या पड़े रस्ते में खाली पैमाने-से हैं लोग.

अयोध्या की गुजारिश

ना मुझे मन्दिर की हसरत,
ना मुझे मस्जिद की ख्वाइश।
बाँट ना बस हिन्द को अब,
मेरी इतनी सी गुजारिश॥

हम तुम दोनों साथ थे

गंध सुवासित केश रूपसी गीले पुलकित गात थे
मौसम नें आवाज लगाई हर देहरी हर द्वार से
नेह लदी लहरें लहरआयी आँचल के हर तार से
निशिगंधा के फूल खिले थे कुछ कहने को अधर हिले थे
असीमता बाहों में आकर सिमटी कुछ मनुहार से
नदिया तीरे बंसी के स्वर गूंजे सारी रात थे
हम तुम दोनों साथ थे

जीवन

जीवन एक सुनहरा अवसर !
मन अपना ब्रह्म सा फैले
ज्यों बूंद बने सागर अपार
नव कलिका से फुल्ल कुसुम
क्षुद्र बीज बने वृक्ष विशाल I

खड़ा कबीरा अलख जगाता---

इधर-उधर लड़ने से पहले,खुद अपने से लड़कर देख
किसी परिंदे जैसा पहले,पर फैलाकर उड़कर देख
नफरत की दीवार ढहा कर,प्यार की खेती-बारी कर,
हरियाली फिर चैनो-अमन की,वतन में अपने मुड़कर देख !
टूटी हुई पतंग-जिन्दगी,बेमकसद क्यों ढोता है ?
उड़ेगा फिर से आसमान में, एक बार तो जुड़कर देख !!

तभी तो पुत्र कहाऊंगा !!

image मेरे तन को अपने तन से
मेरे मन को अपने मन से
वर्द्धित करती धन को धन से
मेरे जीवन को जीवन से!
सुरसा तूं षटरस देती है
अन्नादिक से सुध लेती है
जीवन जीवन भर सेती है
फिर अन्त मुक्ति फल देती है!
जीवन का गणित
जब मै जीवन केimage
जोड़, घटाने
और गुणा, भाग के
प्रश्नों को,
हल नहीं कर पाता हूँ !
तब मै,
मृत्यु के प्रश्न,
पर आता हूँ !
बिन खिलौने के फिर से जो घर जाएगा...

तेरे आने से घर ये निखर जाएगा
मेरा बिगड़ा मुकद्दर संवर जाएगा
हमने महफ़िल सजाई है तेरे लिये
तू न आया तो दिल को अखर जाएगा
प्यार का पाठ मैंने लिखा है मगर
तुम अगर देख लो रस से भर जाएगा

बेसब्री का आलम!


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कार्टून:अयोध्या वाला आईडिया दिल्ली में नहीं चलेगा !!
image
Technorati टैग्स: {टैग-समूह},

Wednesday, September 29, 2010

"मेघों ने अंबर ढक डाला....."(चर्चा मंच अंक - 292)

आज के चर्चा मंच में प्रस्तुत हैं
मेरे द्वारा कुछ तराशे हुए 
कुछ हीरेरूपी ब्लॉग!
मगर इसके लिए
आपको लिंक तो खोलने ही होंगे!
मेघों ने अंबर ढक डाला
मेघ अभी तक गगन में, खेल रहे हैं खेल।
वर्षा के सन्ताप को, लोग रहे हैं झेल।।
अब से मौसम संबंधी भविष्‍यवाणियों की कॉपियां मौसम विभाग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजी जाएंगी
कितना ही आगे बढ़े, मौसम का विज्ञान।
लेकिन बन सकता नही, वो जग का भगवान।।
Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

कार्टून:- अरे ! ये किसका फ़ोन आया ? -

कॉल करो दिल खोलकर, काहे रहो उदास।
बहुत पुराना फोन है, पापा जी के पास।।
मित्रो !
पंजीकरण चालू है,
कृपया जल्द से जल्द इसका लाभ लेवें
ताकि प्रतिभाओं को जल्द ही परिणाम मिले

अलबेला जी लाए हैं, हितकारी प्रस्ताव।
ब्लॉगिंग के भवसिन्धु से, पार करो निज नाव।।
पोलीथीन से निपटने का मिल गया तरीका।
पर्यावरण सुधार में, अपना दो सहयोग। 
पॉलीथीन हटाय कर, जग को करो निरोग।।
तू क़त्ल करने को चला मेरे सुख़नवर को 
सरेआम बाजार में, बिकता है ईमान।
हत्या करने को चला, शायर की धनवान।।
"शब्द " और " काव्य "
काव्य हमेशा ही रहा, शब्दों से धनवान।
शब्दों से होती सदा, मानुष की पहचान।।
अपने देश के बच्चे
विद्या पढ़ने का जिन्हें, नही मिला अधिकार।
कूड़ा-करकट बीनते, भावी राजकुमार।।
बारिशरस से लबालब बारिशरानी से खुली बातचीत :
दैनिक हिन्‍दी मिलाप हैदराबाद में आज
- 
बरखारानी की मनमानी, कहती यही कहानी!
जल जीवन का सम्बल है,
सूना
सब कुछ बिन पानी!
गधा सम्मेलन के लिये ताऊ का सोंटा (Taau's Baton) रवाना

सम्मेलन का लोगो "आपसी भाईचारा बढावो"

सम्मेलन में जा रहा, ताऊ लेकर माल।
गधा हाँकने के लिए, सोंटा रहा संभाल।।
ये सोचने की आपको, दरकार भी नहीं .....


श्री कृष्ण
इससे पहले कि आप मेरी रचना पढ़ें सोचा ...ये चित्रकला दिखा दूँ आपलोगों को ...मेरे बेटे मयंक ने बनाया है बताइयेगा आप क्या सोचते हैं...

माता रचती शायरी, बेटा चित्र बनाय।
प्रतिभा दोनों की बहुत, पाठकगण को भाय।।
अब भी नहीं बदली नत्था की जिन्दगी
नत्थाओं की आड़ में, करते निज कल्याण।
ऐसे अभिनेताओं को, मारो विष के बाण।।
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है
पागल है क्या चन्द्रमा, जो तम हरता जाय।
अँधियारी सी रात में, उजला रूप दिखाय।।
आ पहुँची है फैसले की घड़ी!
धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

"मख़मली परिवेश को क्या हो गया है" 

और अन्त में-
खेल-खेल में मेरी एक कविता बच्चों को समर्पित..

खेल-खेल में दे रही, गाकर जो उपदेश।
शिक्षा से वो भर रही, भारत का परिवेश।।

Tuesday, September 28, 2010

चर्चा मंच – 291 ---- साप्ताहिक काव्य मंच – 18 ( संगीता स्वरुप )

नमस्कार ,आज फिर मैं कुछ काव्य प्रसून इस काव्यांजलि में भर कर लायी हूँ …कुछ पुष्प अपनी सुगंध का परिचय दे रहे हैं तो कुछ अपने रंग का ..आशा है आप सभी  अपनी अपनी पसंद के अनुसार कुछ पुष्पों का रसास्वादन ज़रूर करेंगे …आज की चर्चा मैं श्री कन्हैया लाल नंदन जी की स्मृति में उनको ही समर्पित करती हूँ …  इसी लिए आज आपको सबसे पहले उस ब्लॉग पर ले चलती हूँ जहाँ प्रभात रंजन जी ने उनकी कुछ कविताएँ भाव भीनी श्रृद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत की हैं …
My Photo प्रभात रंजन जी ने अपने ब्लॉग जानकी पुल पर कन्हैया  लाल नंदन जी की स्मृति में कुछ उनकी कविताएँ प्रस्तुत की हैं …आइये आज हम भी इन कविताओं के माध्यम से नंदन जी को श्रृद्धांजलि अर्पित करें ..



(१)
घोषणापत्र
किसी नागवार गुज़रती चीज पर
मेरा तड़प कर चौंक जाना,
उबल कर फट पड़ना
या दर्द से छटपटाना
कमज़ोरी नहीं है
मैं जिंदा हूं
इसका घोषणापत्र है

(२)
बोगनबेलिया
ओ पिया
आग लगाए बोगनबेलिया!
पूनम के आसमान में
बादल छाया,
मन का जैसे
सारा दर्द छितराया,
सिहर-सिहर उठता है
जिया मेरा,
(३)
जीवन-क्रम: तीन चित्र
रेशमी कंगूरों पर
नर्म धूप सोयी।
मौसम ने
नस-नस में
नागफनी बोयी!

 आज के चर्चा मंच पर इस सप्ताह की सबसे ज्यादा मेरी पसंद की रचना आपके सम्मुख है …
वाणी गीत द्वारा लिखी  कविता
    स्त्रियाँ होती हैं ........ऐसी भी, वैसी भी.   दो भाग में कही गयी है …स्त्रियों की मन:स्थिति का , या उनके क्रिया कलापों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है …ऐसी भी और वैसी भी के माध्यम से तुलना भी की है ..

स्त्रियाँ रचती हैं सिर्फ़ गीत
होती हैं भावुक
नही रखती कदम
यथार्थ के कठोर धरातल पर

इन पंक्तियों में एक सार्वभौमिक सत्य को कहा है कि हर स्त्री का मन भावुक होता है ..
बस तुमने ही नहीं जाना है
उनका होना जैसे
खुशबू ,हवा और धूप
वाणी जी ने बहुत सुन्दर उपमा देते हुए कहा है कि हवा , धूप , खुशबू जैसे घर को हर सीलन और बदबू से बचाती है उसी तरह स्त्रियां भी क्लेश , कपट आदि से घर को बचाने का काम करती हैं .
पुरुष दर्प की बात कहने से भी नहीं चुकी हैं …जिसके कारण स्त्रियों के महत्त्व को पुरुष स्वीकार भी नहीं कर पाते .
जानते भी कैसे...
हथेली तुम्हारी तो बंद थी
पुरुषोचित दर्प से
तो फिर
मुट्ठी में कब कैद हुई है
खुशबू , हवा और धूप....

अगली कड़ी में वाणी जी ने कहा है कि आज भी स्त्रियों में सीता और द्रोपदी जैसे चरित्र मिलते हैं ..
जीवन -पथ गमन में
सिर्फ पति की अनुगामिनी
************************
अपमान के घूंट पीकर
जलती अग्निशिखा -सी
लेकिन फिर भी सिर झुका कर सब कुछ सहने को तैयार नहीं होती हैं ..
अब नही देती हैं
वे कोई अग्निपरीक्षा...
**************
किन्तु अब नहीं करती हैं
वे पाँच पतियों का वरण
कुंती या युधिष्ठिर की इच्छा से
बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती इस रचना के लिए वाणी जी को साधुवाद ..
स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैं
स्त्रियाँ वैसी भी होती हैं
बस तुमने नहीं जाना है
स्त्रियों का होना जैसे
खुशबू, हवा और धूप
मेरा फोटो एम० वर्मा जी प्रवाह  पर बिखरे हुए एहसास को समेटते हुए अपने मन की संवेदनाओं को लाये हैं ..

बिखरे हुए एहसास ..


सरसों सरीखे -
अतिसूक्ष्म
कुछ एहसास
बिखर गये थे उस दिन
तुम्हारी देहरी के इर्द-गिर्द
My Photo रंजना  (रंजू भाटिया )  आज एक सच  रख रही हैं सामने .. मन के बादल गर फट गए तो कैसी तबाही होगी …उसका नज़ारा ज़रा देखते जाइये

सुना है
लेह जैसे मरुस्थल में भी
बादल फट कर
खूब तबाही मचा गए हैं
जहाँ कहते थे
कभी वह बरसते भी नहीं
ठीक उसी तरह
जैसे मेरे मन में छाए
घने बादल
मेरा फोटो राकेश जैन  जी का ब्लॉग है कविता मंजरी ….जब गीता  पढ़ कर लोगों की सोच नहीं बदली है तो कैसे बदलेगी यही चिन्ता व्यक्त की है उन्होंने अपनी रचना में … 
जब बदला नहीं समाज

जब बदला नहीं समाज,राम की चरित कथाओं से /
बदलेगा फिर बोलो कैसे गीतों,कविताओं से   / /
जो गिरवी रखकर कलम ,जोड़ते दौलत से यारी/
वे खाक करेंगे आम आदमी की पहरेदारी  / /
जब तक शब्दों के साथ कर्म का योग नहीं होता/
थोथे शब्दों का तब तक कुछ उपयोग नहीं होता/
My Photo



अशोक व्यास जी अपनी कविता में बता रहे हैं कि मात्र बैठ कर सोचने से बदलाव नहीं हो सकता …उसके लिए प्रयास करना होगा तभी पूरी होगी
बदलाव की आशा

नहीं चलेगा
बैठे बैठे
किसी बदलाव की आशा करने का शगल
पसीना बहाओ
अगर
चाहते हो समस्याओं का हल
मेरा फोटो



अंजना  ( गुड़िया) जी
रंग बिरंगी एकता  ब्लॉग पर एक ऐसी कविता लायी हैं जिसे पढ़ कर एक बार ज़रूर मुँह से निकलेगा …ओह ….मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है ..
ऐ इंसानियत, तुझे मेरी परवाह ही नहीं!
रोती भी नहीं, चिल्लाती भी नहीं,
जानती है, कोई सुनेगा ही नहीं


सर पर छत, पेट भर खाना,
आदत भी नहीं, कोई आस भी नहीं
My Photo प्रतिभा सक्सेना जी की लेखनी मुझे अपने आकर्षण में हमेशा बाँध लेती है …उनकी रचनाएँ इतनी सशक्त होती हैं कि उनको आप तक न  पहुंचाऊं  तो कुछ कमी सी लगती है …आप उनकी लेखनी का चमत्कार देखिये ..श्यामला में ..

ईषत् श्यामवर्णी,
उदित हुईं तुम
दिव्यता से ओत-प्रोत
अतीन्द्रिय विभा से दीप्त
मेरे आगे प्रत्यक्ष .
मैं ,अनिमिष-अभिभूत-
दृष्टि की स्निग्ध किरणों से
अभिमंत्रित, आविष्ट .
कानों में मृदु-स्वर-
'क्या माँगती है, बोल ?'
*

रोली पाठक देश के किसानो की व्यथा को अपनी कविता में उतार कर लायी हैं …..संवेदनशील मन से लिखी संवेदनशील रचना

आत्महत्या...

सूने-सूने नयन
करता चिंतन-मनन
बाढ़ की तबाही से
उजड़ गया जीवन...
डूब गया खलिहान
बह गया अनाज
कर दिया बाढ़ ने,
दाने-दाने को मोहताज.


मेरा फोटो
निर्झर नीर शहर की बात करते हैं ..अपने मन की गिरह की बात कर रहे हैं ..गज़ल बहुत खूबसूरत है…आपकी नज़र से बची हो तो ज़रूर पढियेगा ..

गले लगा तो जरा

ना कर तर्क-ए-वफ़ा कांटे पे जरा तोलूँगा
खरा है कौन यहाँ सारे भरम खोलूँगा !
सूली  पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा
My Photo कुसुम ठाकुर जी मन के भावों को सुन्दर शब्दों में पिरो कर खूबसूरत गज़ल कह रही हैं




"सारे वादों को मैं भूल जाऊँ सही "
सारे वादों को मैं भूल जाऊँ सही
और कसमों को दिल से मिटाऊँ सही
एक तुम ही सदा रहनुमा थे मेरे
सारे मंज़र को दिल में उतारूँ सही
मेरा फोटो



शारदा अरोरा जी एक गीत गज़ल कह रही हैं

इतना चुप हो जाऊँ
इतना चुप हो जाऊँ
कि बुत हो जाऊँ
तराशे गए हैं अक्स भी
मैं भी सो जाऊँ

सर्द आहों से पलट
जमाने की हवा हो जाऊँ
My Photo


        ऋतु सिंह  ऋतु... और एक आधा सच »  पर शिव के दर्शन करा रही हैं

शिवोहम

एक मुनि की एक कुटी में,
स्वर गुंजित, अक्षत चन्दन से,
तिलक सुशोभित भौं मध्य में,
शिव-त्रिशूल, भंगम, भभूत से ||….

राम मंदिर कब बन पायेगा    [दीपक भारतदीप..की एक हास्य कविता ]

एक राम भक्त ने दूसरे से कहा
‘वैसे तो राम सभी जगह हैं,
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान की बड़ी वजह हैं,
घर घर में बसे हैं,
घट घट में इष्ट की तरह श्रीराम सजे हैं श्रीराम
पर फिर भी जिज्ञासावश
अयोध्या के राम मंदिर का ख्याल आता है,
चलो किसी समाज सेवक से चलकर
पूछ लेते हैं कि
वह कब तक बन पाता है।’

My Photo सोनल रस्तोगी जी इस बार कुछ शरारत के मूड में लग रही हैं …खुद ही कह रही हैं कि बेचैन करने में एक अलग सा मज़ा है ….

चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ

इतनी नजदीकी अच्छी नहीं
चलो कुछ खफा हो जाती हूँ
अपना ही मज़ा है बेचैन करने का
चलो मैं बे-वफ़ा हो जाती हूँ
तेरे सामने आऊं भी नहीं
तुझे महसूस हर लम्हा रहूँ
मांगे तू भी साथ मेरा शिद्दत से
चलो मैं खुदा सी हो जाती हूँ




वंदना सिंह दुआ मांग रही हैं कि
काश  कुछ ऐसा हो …

काश ! के जिन्दगी से आगे
हम एक कदम बढ़ाये
खुद को खुद से ले चले कहीं दूर
जहाँ अहम् कि बेडिया
मासूम सी ख्वाहिशो को
कभी जकड ना पायें ..
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  कुछ मेरी कलम से  पर भाव बोध  लाये हैं ..आत्म बोध का भी ज्ञान कराती रचना का आप भी रसास्वादन करें
 My Photo
मैं
भाव-बोध में
यूं अकेला चलता गया,
एक दरिया
साथ मेरे
आत्म-बोध का बहता गया।
रास्तों के मोड़ पर
चाहा नहीं रुकना कभी,
वो सामने आकर
मेरे सफर को
यूं ही बाधित करता गया
मेरा फोटो
विवेक रंजन जी फूल ,सुगंध और साया रोपना चाह रहे हैं एक मीठे नीम के साथ ..

हमारे मंदिर और मस्जिद को ..

रोपना है मीठी नीम अब हमें
कभी देखा है आपने किसी पेड़ को मरते हुये ?
देखा तो होगा शायद
पेड़ की हत्या , पेड़ कटते हुये
हमारी पीढ़ी ने देखा है एक
पुराने , कसैले हो चले
किंवाच और बबूल में तब्दील होते
कड़वे बहुत कड़वे नीम के ठूंठ को
ढ़हते हुये

image

रचनाकार    पर पढ़िए विजय वर्मा की कविता अहम के बीज
किस तरह अहम पोषित और पल्लवित होता है यह इस रचना को पढ़ कर पता चलता है ..
अहं के बीज
बोये थे मैंने ,
दोस्तों ने भी मिथ्या-प्रशंसा के
उर्वरक डाले थे.
कैसे-कैसे भ्रम मैंने
मन में पाले थे
My Photo राजीव जी अपनी कविता से एक सशक्त सन्देश दे रहे हैं नारियों को ……जो अब तक सहा है उसे अब नहीं सहना …ऐतिहासिक उदाहरणों को देते हुए एक सार्थक सन्देश अब और नहीं ...

आजतक जो हुआ
उसे भूल जाना
एक डरावना
अतीत समझकर,
बनना ही होगा तो बनना
रांझे की हीर,
बनकर शीरी
खोज लेना अपना फरहाद
जो रहेगा सदा तेरे साथ
हमदम,हम-कदम बनकर ।

उत्तम कुमार जी का ब्लॉग है ..
Truth Or Dare….. इनकी कुछ रचनाएँ पढ़ीं , सभी सच के बहुत करीब लगीं …आज की कविता जीवन की सच्चाई को बता रही है …

हरे और सूखे पत्ते
पेड़ के निचे  गिरे हुए पत्तों पे  झुककर
हसतें हैं हरे पत्ते, सुखे पत्तों को देखकर 
शायद  उन्हें पता  नहीं  उस दिन का
अंदाज नहीं कर पाते हैं उस क्षण का
एक दिन निचे गिरेंगे वो भी सुखकर
हसतें हैं  हरे पत्ते, सुखे पत्तों को देखकर
मेरा फोटो



सुधीर शर्मा   का ब्लॉग है   
डाकिया
चिट्ठियां ज़िन्दगी के पते पर...…लाये हैं रूह को तापने 
आओ आ जाओ
किसी रोज़ मेरे आँगन में...
अपने चेहरे के
उजालों की तीलियाँ लेकर
लौट आयीं हैं यहाँ
सर्द हवाएं फिर से
आओ आ जाओ
किसी रोज़ मेरे आँगन में...

बना रहे बनारस     पर पढ़ें दीपंकर जी की रचना 

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पुनरुत्थान
फिर एक बार उठता हूँ मैं
अपने शोणित के रूदन से
विवशता गढ़ती है मेरी फूली हुई साँसें
रोमकूपों से उठती हुई थकन की लकीरें
लिखती हैं कुछ गीत मेरी पेशानी पर
पकते हैं कुछ स्वप्न मेरी आँखों में

आशीष जी ने एक गज़ल पोस्ट की है अपने ब्लॉग AAWARA SAJDE »  पर ..गज़ल पसंद आई  क्या बात है …आप भी पढ़ें

किताबों के पन्नों को पलट कर सोचता हूँ

किताबों के पन्नों को पलट कर सोचता हूँ
यूँ पलट जाये ज़िन्दगी तो क्या बात है
ख्वाबों में रोज़ मिलते हैं जो
हकीक़त में आए तो क्या बात है

मेरा फोटो

मीमांसा  पर  रश्मि सविता ख्यालों की दुनिया से जल्दी ही बाहर आ कर हकीकत पहचान रही हैं ..
"तुम बादल की तरह ,
छा जाओ अगर .....
मै बरसना चाहूंगी ,
रिमझिम- रिमझिम.....
तुम्हारी धूप के सिर्फ 
एक टुकड़े के लिए ,
रहता है ये भीगा  मौसम
गुमसुम-गुमसुम.........

मेरा फोटो
.साधना वैद जी कह रही हैं ... 

* हमारी भी सुनो *

मैं राम,
मैंने तो तुम्हें सदा
दया का मार्ग दिखाया था,
सदा प्रेम और अहिंसा का
पाठ पढ़ाया था !

मेरा फोटो
अनुपमा पाठक की लेखनी बहुत कुछ ऐसा लिखती रही है जो सोचने पर मजबूर कर देती है
आज उनकी लेखनी कहाँ रमी हुयी है आइये देखते हैं ..

लेखनी है रमी... आज लिख डालो!
आँखों की सकल
नमी... आज लिख डालो!
आसमानी सपने छोड़
दूब जिसको है समर्पित
चरणों के नीचे वो ठोस
जमीं... आज लिख डालो!




वंदना गुप्ता
सप्तरंगी पर हुस्न और इश्क का संवाद लायी है इस कविता में ..
मिलन को आतुर पंछी
आ ख्यालों की गुफ्तगू
तुझे सुनाऊँ
एक वादे की
शाख पर ठहरी
मोहब्बत तुझे दिखाऊँ
हुस्न और इश्क की
बेपनाह मोहब्बत के
नगमे तुझे सुनाऊँ
 मनोज जी की यादों ने करवट ली है और बहुत कोमल से एहसास बाहर निकल आये हैं .. .कुछ यादों में अटकी अटकी ..और यादों को भटकाती सी नज़्म को पढ़िए उनके ब्लॉग मनोज  पर .
खामोशियाँ कहाँ ले जाती हैं …आप भी जानिए ..


खामोश यूँ लेटे हुए
तेरे अक्‍स
ख़्वाबों में समेटे हुए
खामोश यूँ लेटे  हुए
यादों में सोचता हूँ
उस गुलशन में
तेरे साथ
गुज़रे पल
और
झर रहे फूलों के बीच
दबे पांव तेरा आना।
मेरा फोटो आशा ढौंडियाल  जी का ब्लॉग है वैचारिकी …जिस पर वो कुछ बता रही हैं ..

चुपके से ..
धूप का इक उजला सा टुकड़ा 
आंगन में उतरा चुपके से 
आँख का आंसू मोती बनके 
गालो पर ढलका चुपके से 
फूलों की खुशबु ले हवा चली,  
चली मगर बिलकुल चुपके से 
भवरो ने भी रस की गागर  
छलकायी लेकिन चुपके से


My Photo
सांझ  शायद खुद की ही तलाश में अपना ब्लॉग लायी हैं   In search of Saanjh….
और इस पर पेश है एक निहायत खूबसूरत गज़ल ..
हिना

हथेलियों पे कुछ कलियाँ सजा गयी है हिना
खिलेंगी या के बस बहला के आ गयी है हिना


हमने पूछी जो खबर आज उनके आने की
ऐसा लगता है जैसे हिचकिचा गयी है हिना
My Photo
रावेंद्र रवि जी रवि मन  पर एक बहुत सुन्दर नवगीत लाए हैं …प्रकृति के सौंदर्य को परिभाषित करते हुए उनकी रचना पढ़िए 



क्वाँर की दहलीज पर
गुनगुनी होने लगी है
दपदपाती धूप अब तो
क्वाँर की दहलीज पर धर पाँव!
नवविवाहित युगल-जैसी
मुदित है हर भोर अब तो
हो रहा मधुमास पूरा गाँव
मेरा फोटोचर्चा के समापन की ओर बढाते  हुए डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी शहर की भीड़ भाड़ को  कम करने का एक सार्थक उपाय बता रहे हैं …

"छोड़ नगर का मोह"
छोड़ नगर का मोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
मन से त्यागें ऊहापोह,

आओ चलें गाँव की ओर!
ताल-तलैय्या, नदिया-नाले,

गाय चराये बनकर ग्वाले,

जगायें अपनापन व्यामोह,

आओ चलें गाँव की ओर
 चर्चा का समापन करते हुए यह काव्यांजलि आप सभी पाठकों को समर्पित …इसके सभी पुष्प आपको सम्मोहित करेंगे इसी आशा में आज की चर्चा यहीं समाप्त करती हूँ …पिछली बार एक पाठक का कहना था कि कोई ऐसी व्यवस्था हो कि लिंक दूसरी विंडो में खुले …तो एक बात बताना चाहूंगी …..यदि आप चित्र पर क्लिक करेंगे तो लिंक दूसरी विंडो में अपने आप खुल जायेगा …यहाँ हर चित्र में लिंक लगा हुआ है …आप प्रयोग कर देख सकते हैं ….
आपकी प्रतिक्रिया सदैव हमारा मनोबल बढ़ाती है …आपके सुझावों का स्वागत है ….शुक्रिया ….फिर मिलते हैं अगले मंगलवार को ….नमस्कार

Monday, September 27, 2010

क्या सचमुच बेटियों का भी दिन होता है ? ............चर्चा मंच-290

दोस्तों,
यूँ तो कल बेटियों का दिन था तो कुछ पोस्ट उन्ही पर ली हैं मगर क्या सचमुच बेटियों का भी दिन होता है ?

आकाश मे विचरण करती
उन्मुक्त चिरैया
आँगन की गौरैया,
मन आँगन मे थिरकती
मचलती
अरमानों की बिजुरिया
मगर फिर भी इक
बोझ सम गुनी जाती हूँ
और कोख मे ही
मिटा दी जाती हूँ
फिर सच क्या है?
वो जो तुम दिखाते हो
या वो जो तुम
करके बताते हो?
बेटी के अस्तित्व की
बखिया उधेड जाते हो
अपने अस्तित्व को
मिटा कर फिर कैसे
माँ बाप कहाते हो ?

ये कुछ शाश्वत प्रश्न आज हर बेटी कर रही है और उन्ही से कर रही है जो उसके जन्मदाता हैं खास तौर पर उन माँ बाप से जो बेटी को आज भी उसकी पहचान नहीं दे पा रहे हैं और अगर ऐसा चलता रहा तो एक दिन जब उनका अस्तित्व मिट जायेगा तो सृष्टि ही ख़तम होने के कगार पर आ जाएगी ............इसलिए अभी से अगर थोडा चेत जायें तो हम सभी का भविष्य उज्जवल होगा ..............ज्यादा बड़ा लिख दिया मगर माफ़ी चाहती हूँ मन के भावों को कहने से रोक नहीं पाई.
चलिए चलते हैं आज की चर्चा पर ------------

हैप्पी डॉटर्स डे ....मेरी बुलबुल

 काश ! सच में सब ये समझ पायें 

 

 

डाटर्स-डे पर पाखी की ड्राइंग...

आहा ! इतनी सुन्दर ! ये सिर्फ बेटियां ही कर सकती हैं !



बेटियों के प्रति नजरिया बदलने की जरुरत (डाटर्स-डे पर विशेष)

जिस दिन बदल जायेगा उस दिन बेटियों की ज़िन्दगी का नक्शा ही बदल जायेगा 

 

 

दौटेर्स डे के बहाने ..........

शायद तभी मन के भाव बाहर आ पाएं 




आज 'डाटर्स -डे' यानी बेटियों का दिन

एक प्रश्नचिन्ह ?

 

 

प्रिय बेटी,समर्पित ये दिन तुझको

काश ! सब ऐसा सोच पाते .

 

 

कंधे के ऊपर उठो : एक कविता बेटी के लिए

अब तो उठना ही होगा ...........आकाश छूना ही होगा 



बस बेटी को बेटी ही समझ लो -------पराई नही अपनी ही समझ लो 




आज कौन मानता है कन्या ?




मानो तो सब कुछ ना मानो तो बोझ 


दुनिया के ढ़ंग निराले … (रफत आलम)

तभी तो दुनिया नाम है ...........





कंजूस-मक्खीचूस

इन्हें भी झेल लेंगे जी -------

 

 

दंभ हर बार टूटा... dambh har baar toota...

दंभ तो होता ही टूटने के लिए है --------

 

 

 

क्‍या आप विश्‍वसनीय हैं? बचपन के इस “प्रश्‍न” को आज मैंने अलविदा कह दिया है – अजित गुप्‍ता
क्या कहा जा सकता है जी ----------अच्छा किया अलविदा कह दिया




ऐसा भी होना चाहिए 







कुछ मोहब्बत के ख्याल .......
जब ख्याल मोहब्बत के हों तो कहने को क्या बचता है ------






उसका अपराध आत्महत्या थी ।
सही कहा ..............परिस्थिति हो या ना हो कारण मगर अपराध तो कर ही दिया ना 



हर शहर में एक स्‍त्री का स्‍थापत्‍य

अगर ऐसा हुआ तो ??

 

 

बिखरे हुए एहसास ....

कब तक कहते रहोगे? 



आज की चर्चा को यहीं विराम देती हूँ और अगले सोमवार फिर मिलती हूँ।तब तक अपने कीमती विचारों से अवगत करा कर मेरा हौसला बढाइये।

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