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Friday, April 30, 2010

कैसे समझाये इन्हें......(चर्चाकारा:अदा)

लीजिये पेश है आज की चर्चा,  कई और भी अच्छी पोस्ट्स पढने को मिली लेकिन वहां से कॉपी करना मुहाल हो गया मसलन 'दिलीप जी', 'रश्मि प्रभा जी;  और भी कई… हम कॉपी ही नहीं कर पाए...फिर ये भी सोचा क्या पता कुछ गलती ही न हो जाये हमसे कॉपी करके...इसलिए पहले पूछ लेंगे ...
तो फिर शुरू कीजिये ...ब्लॉग दौरा.. ..और का...हाँ नहीं तो...!!
कैसे समझाये इन्हें......प्रियदर्शिनी तिवारी जी की प्रस्तुति...

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"बेटा ..तुम्हारे सर मै दर्द है ...तुम्हारे घर फोन कर दूं? ..घर जाओगे?
"..नहीं .मुझे घर नहीं जाना ...मै यही सिक रूम मै लेटारहूगा ..घर जाऊंगा तो सब नाराज़ हो जायेगे राहुल बोला
राहुल एक होनहार .,बुद्धिमान ,और भावुक बच्चा है ..सबको वह बहुत प्यार करता है ..उससे किसी का दुःख-दर्द नहींदेखा जाता ..वह किसी को भी नाराज़ नहीं करना चाहता ॥
साहित्य के ध्रुव
उड़न तश्तरी...समीर जी का कहना है..
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एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी.
पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो गया. हर गांववासी प्रसन्न होकर नाच रहा था.
देखने में आया कि गांव के कुत्ते भी खुशी से झूम झूम कर नाच रहे थे. यह आश्चर्य का विषय था.
लोगों ने कुत्तों से जानना चाहा कि भई, तुम लोग क्यूँ नाच रहे हो?
कुत्तों ने बड़ी सहजता से जबाब दिया कि जब बिजली आयेगी तो इतने सारे खम्भे भी तो लगेंगे.
अशेष

आशा जोगलेकर जी की प्रस्तुति...

पैसठवा साल खत्म हो गया मेरा । जिंदगी के इस मोड पर आकर लगता है अब कुछ पाना शेष नही है । किसी बात का अफसोस भी नही, उन बातों का भी नही जो कुछ साल पहले तक भीतर तक दुख पहुंचाती थीं कि हाय, मैने ऐसा क्यूं नही किया । पर अब प्रसन्न हूँ जो कुछ किया उसमें मेरी औऱ ईश्वर की, दोनों की, मर्जी थी । कुछ और करती तो जीवन कुछ और तरह का हो जाता । पर मुझे तो यही राह चुननी थी जो मैने चुनी ।
मासूम परिंदों की प्यासी पुकार सुनिए, एक बर्तन पानी का भरकर रखिये ---- अमित शर्मा

इन दिनों भयंकर गर्मी पड़ रही है, और  इस गर्मी में अगर सबसे ज्यादा शामत किसी की आ रही है तो वे है बेजुबान पक्षी.
पेड़-पौधे, नदी-पर्वत की तरह  पशु-पक्षी भी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं।बेजुबान पक्षियों की रक्षा हमारा कत्र्तव्य है, धर्म है।
ठंडा ठंडा मटके का पानी गर्मी में प्यास बुझाए, तड़पत तपत तन-मन में फिर से प्राण बसाए!!ठंडा ठंडा मटके का पानी गर्मी में प्यास बुझाए, तड़पत तपत तन-मन में फिर से प्राण बसाए!!

दिनेशराय द्विवेदी  जी की प्रस्तुति...

अखबार में खबर है, कोटा के जानकीदेवी बजाज कन्या महाविद्यालय को एक वाटर कूलर भेंट किया गया। पढ़ते ही वाटर कूलर के पानी का स्वाद स्मरण हो आता है। पानी का सारा स्वाद गायब है। लगता है फ्रिज से बोतल निकाल कर दफत्तर की मेज पर रख दी गई है। बहुत ठंडी है लेकिन एक लीटर की बोतल पूरी खाली करने पर भी प्यास नहीं बुझती। मैं अंदर घर में जाता हूँ और मटके से एक गिलास पानी निकाल कर पीता हूँ। शरीर और मन दोनों की प्यास एक साथ बुझ जाती है।
इधर होली के पहले और बाद में बाजार में निकलते ही मटकों की कतारें लगी नजर आने लगती हैं। शहर की कॉलोनियों में मटकों से लदे ठेले घूमने लगती हैं। गृहणी ठोक बजा कर चार मटके खरीद लेती है। मैं आपत्ति करता हूँ -चार एक साथ? तो वह कहती है पूरी गर्मी और बरसात निकालनी है इन में। सर्दी के बने मटके हैं पानी को ठंड़ा रखेंगे। दो मटके मैं उठा कर घर में लाता हूँ और दो गृहणी। घर में फ्रिज है उस में
खामियाजा !

पी.सी. गोदियाल जी की प्रस्तुति...
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दो ही रोज तो गुजरे जुम्मे-जुम्मे
मगर अब शायद ही याद हो तुम्हे,
किसी बेतुकी सी बात पर भड़ककर
उतर आये थे तुम दल-बल सडक पर,
तुमने अपनी नाखुशी जताने को
राह चलते राहगीर को सताने को ,
जब अपने ही ......

देवेश प्रताप जी की प्रस्तुति...
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क ही देश कि मिटटी में जन्में लोग जिसमें से कुछ उस मिट्टी कि सुरक्षा के लिए अपनी जान कि बाजी लगा देते है ..और कुछ अपने ही देश कि मिटटी को बेचना शुरू कर देते है । जैसा कि अभी एक महिला आई यफ यस अधिकारी को भारत कि गुप्त सूचनाओं को पाकिस्तान के आईएसआई तक पहुचाने का मामला सामने आया है । ये बड़े ही शर्म कि बात है ....उच्च पद पर नियुक्त अधिकारी अपने देश के साथ धोखा देने के बारें में सोच भी कैसे लेते है । क्या उनका ज़मीर ऐसा करते हुए ज़रा से भी नहीं धिकारता । क्या उनके जहन में एक बार भी ये बात नहीं आती कि इसी देश की सुरक्षा करते हुए बहादुर सैनिक शहीद हो जाते है । दुशमन के साथ जब कोई अपना मिल जाये तो दुशमन के लिए हर रस्ते आसान हो जाते हैं ।
इसी तर्ज पर एक कहानी सुनाता हूँ,जो एक मेरे मित्र ने हमें सुनाई थी ।
मेरी बिटिया
साधना वैद्य जी की प्रस्तुति...
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प्यारी बिटिया मुझको तेरा ‘मम्मा-मम्मा’ भाता है,
तेरी मीठी बातों से मेरा हर पल हर्षाता है !
दिन भर तेरी धमाचौकड़ी, दीदी से झगड़ा करना,
बात-बात पर रोना धोना, बिना बात रूठे रहना,
मेरा माथा बहुत घुमाते, गुस्सा मुझको आता है,
लेकिन तेरा रोना सुन कर मन मेरा अकुलाता है !
फिर आकर तू गले लिपट सारा गुस्सा हर लेती है,
अपने दोनों हाथों में मेरा चेहरा भर लेती है,
गालों पर पप्पी देकर तू मुझे मनाने आती है,
‘सॉरी-सॉरी’ कह कर मुझको बातों से बहलाती है !
माँ, पत्नी और बेटी------एक कविता-------->>>>>ललित शर्मा


माँ-पत्नी और बेटी
पृथ्वी गोल घुमती है
ठीक मेरे जीवन की तरह
पृथ्वी की दो धुरियाँ हैं
उत्तर और दक्षिण
मेरी भी दो धुरियाँ हैं
माँ और पत्नी
मै इनके बीच में ही
घूमता रहता हूँ
माँ कहती है,
आँगन में आकर बैठ
खुली हवा में
पत्नी कहती है
अन्दर बैठो
सावन में आग लग गई................

शेखर कुमावत



जबसे जिन्दगी एक हसीन सफ़र बन गई |
दिल को उसी दिन से नई तलब लग गई ||
जालिम जमाना कहता सावन बरस रहा |
मगर हम कह रहे सावन में आग लग गई ||
एक और इंसान – कहानी

अनुराग शर्मा…..An Indian in Pittsburgh - पिट्सबर्ग में एक भारतीय

की प्रस्तुति...

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खिल्लू दम्भार मर गया साहब!”
अधबूढ़े का यह वाक्य अभी भी मेरे कानों में गूंज रहा है। वैसे तो मेरे काम में सारे दिन ही कठिन होते हैं मगर आज की बात न पूछो। आज का दिन कुछ ज़्यादा ही अजीब था। सारा दिन मैं अजीब-अजीब लोगों से दो-चार होता रहा। सुबह दफ्तर पहुँचते ही मैले कुचैले कपड़े वाला एक आदमी एक गठ्ठर में सूट के कपड़े लेकर बेचने आया। दाम तो कम ही लग रहे थे। मगर जब उसने बड़ी शान से उनके सस्ते दाम का कारण उनका चोरी का होना बताया तो मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने पुलिस बुलाने की बात की तो वह कुछ बड़बड़ाता हुआ तुरंत रफू चक्कर हो गया।
मैं देर करता नहीं

श्री संजय अनेजा जी की प्रस्तुति..

आज हम अपना पिछला जेंटलमैन प्रॉमिस पूरा कर रहे हैं जी, दस मिनट बनाम दो घंटे वाला। तो साहब, हुआ ये कि मैं अपनी बाईक उठाकर बाज़ार की ओर चल दिया। बाजार के रास्ते में एक तिराहा आता है, जिसका नाम मैंने बारामूडा ट्राईएंगल रखा है। पता है जी कि तिराहे और ट्राईएंगल में फ़र्क होता है, हमने भी अंग्रेजी पढ़ी है(हिंदी माध्यम से), पर ति, TRI से मतलब तीन का ही होता है, इसलिये हमारा रखा नाम बिल्कुल ठीक है। इत्ता बड़ा नाम इसलिये रखा है कि उस तिराहे से निकलते समय हमेशा कुछ न कुछ होने का चांस रहता है, हमारे साथ।
सीधी बात है कहने दो
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इन्द्रनील भट्टाचार्जी की प्रस्तुति...

दिल में मुहब्बत नहीं...
सैल तकल्लुफ रहने दो....
पहली मुलाकात ...दिगम्बर नासवा जी की प्रस्तुति..

काम के सिलसिले में आने वाला सप्ताह ब्लॉग-जगत से दूर रहूँगा ...... जाते जाते ये कविता आपके सुपुर्द है ...
सुनो
क्या याद है तुम्हे
पहली मुलाकात
पलकें झुकाए
दबी दबी हँसी
छलकने को बेताब
वो अल्हड़ लम्हे
भीगा एहसास
हाथों में हाथ लिए
घंटों ठहरा वक़्त
उनिंदी रातें
कहने को
अनगिनत बातें
गुरु गोविन्द दोउ खड़े….फ़िरदौस ख़ान जी की प्रस्तुति..

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हमने अपनी पिछले पोस्ट में हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत और पारंपरिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परंपरा का ज़िक्र किया था...
बात उन दिनों की है जब हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे... हर रोज़ सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद रियाज़ शुरू होता था... सबसे पहले संगीत की देवी मां सरस्वती की वन्दना करनी होती थी... फिर... क़रीब दो घंटे तक सुरों की साधना... इस दौरान दिल को जो सुकून मिलता था... उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है...
इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस... ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना... संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता... हमारे गुरु जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे... वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे... उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं... गुरु जी के बेटे और बेटी हम सब के साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे... कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था...
ताऊ प्रकाशन का सद्-साहित्य पढ़िए..
आदरणीय ब्लागर गणों, आप सभी को रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" की आदाब अर्ज..नमस्कार. आज कल ताऊ ब्लागजगत में कम दिखाई दे रहे हैं क्योंकि ताऊ प्रकाशन सद साहित्य के प्रकाशन में अनेकों पुस्तकों की छपाई का काम चल रहा है.
इन पुस्तकों को पढकर हर एक ब्लागर सदगति को प्राप्त हो सकता है. ऐसे पुनीत और पावन कार्य में आजकल ताऊ लगा हुआ है. आज मैं कुछ ताऊ प्रकाशन साहित्य की पुस्तकों से आपको रूबरू करवाता हूं जो बहुत विद्वान ब्लाग साहित्यकारों द्वारा लिखी गई हैं.
मुंबई ब्लॉगर्स मीट- बोलती तस्वीरें! भूल सुधार! माफी-माफी!बार-बार माफी!…..विभा रानी जी की प्रस्तुति..

भूल, भूल, बहुत बडी भूल! माफी, माफी, सबसे माफी! न कोई इरादा, न कोई मंशा, मगर भूल मंशे के साथ तो नहीं की जाती. छम्मकछल्लो की उतावली अपने पहले ब्लॉगर्स मीट की चन्द तस्वीरें ब्लॉग पर डालने की. आधी रात में उसे समय मिला, आधी रात में उसने डाल दी. एक तस्वीर में घुघुती जी की साइड प्रोफाइलवाली तस्वीर चली गई. छम्मकछल्लो ने उन्हें कहा था कि वह उनकी तस्वीर हर्गिज़ नहीं डालेगी, अगर वे नहीं चाहती. किसी के निजी जीवन की बातों की मर्यादा तो निभाई ही जानी चाहिये. मगर यह तस्वीर चली गई और यार लोगों को जैसे एक छुपा खज़ाना मिल गया. बच्चों से किलक उठे कि भई हां जी, हमने घुघुती जी आपको देख लिया. तस्वीर की जगह भी बता दी. छम्मकछल्लो शाम में ही ब्लॉग से मुखातिब हो पाती है. लेकिन शाम में घर जाने के रास्ते पर थीं कि एक भाई का फोन आ गया. छम्मकछल्लो ने कहा कि वह घर जा कर सबसे पहला काम यही करेगी. कि तभी एक दूसरे शुभचिंतक का आ गया. छम्मकछल्लो के कहने के बावज़ूद वे पांच मिनट तक अपनी अमृतवाणी से छम्मकछल्लो को आप्यायित करते रहे. फिर फोन रखा और फिर तुरंत फोन किया. नसीहत दी, फिर फोन धर्मपत्नी को पकडा दिया. आखिर उन्हें भी तो अपनी मर्यादा निभानी थी. पति और पत्नी दो अर्धांग मिलकर पूर्णांग बनते हैं, इसलिए दोनों की लानत-मलामत से छम्मकछल्लो कबीर के अनह्द नाद की तरह ऊपर से नीचे तक सराबोर हो गई. अभी वह ब्लॉग को एडिट कर रही है. घुघुती जी वाली तस्वीर निकाल दी है. अब छम्मकछल्लो अपने पूरे होशो-हवास के साथ पत्नी जी के आदेशों का पालन करते हुए यह माफीनामा लिख रही है. जान लीजिए कि उसका मकसद घुघुती जी को तस्वीर के माध्यम से जग जाहिर नहीं करना था. करना ही होता तो सामने के प्रोफाइलवाली कई तस्वीरें उसके पास हैं, वही लगा देती. लेकिन इतनी मर्यादा का तो उसे भी पता है.
और अन्त में देखिए……..सुजाता जी की प्रस्तुति..
सिनेमा देखने जाएंगे तो गँवारू ही कहलाएंगे, मूवी देखिए जनाब !!

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आप अपने घर को फ्लैट कहना पसन्द करते हैं या अपार्टमेंट ? फिल्म देखने जाएँ तो उसे सिनेमा देखना कहेंगे या मूवी ? भई तय रहा कि आप 'सिनेमा देखने जाएंगे ' तो गँवारू ही कहलाएंगे । मूवी देखिए जनाब !! ई मूवी अमेरिका वाला भाई लोग ने बनाया है न!
गुलामी कोई देश केवल भौतिक रूप से नही करता। गुलाम देश की भाषा भी गुलामी के संकेत देने लगती है और धीरे धीरे दिमाग ही गुलाम हो जाते हैं।अंग्रेज़ की गुलामी के दौर मे उपनिवेश का आर्थिक शोषण-दोहन किया जाता था । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शोषण के इस रूप को समझ रहे थे और कभी छिपे -खुले ज़ाहिर भी कर रहे थे ।'निज भाषा ' की उन्नति भी उनकी चिंता थी । उनकी ये मारक लाइने नही भूलतीं -
अंग्रेज़ राज सुख साज सजै सब भारी
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी

Thursday, April 29, 2010

“साहित्य के ध्रुव/सद् साहित्य पढिये” (चर्चा मंच-136)

"चर्चा मंच" अंक - 136
आइए आज का "चर्चा मंच" सजाते हैं-
साहित्य के ध्रुव - एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी. पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो ग...
ताऊ प्रकाशन का सद साहित्य पढिये : सफ़ल ब्लागर बनिये! - आदरणीय ब्लागर गणों, आप सभी को रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" की आदाब अर्ज..नमस्कार. आज कल ताऊ ब्लागजगत में कम दिखाई दे रहे हैं क्योंकि *ताऊ प्रकाशन सद साहित्य* क...
वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री राजेंद्र स्वर्णकार - प्रिय ब्लागर मित्रगणों, हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई है...
आख़िर, जंगल का भी अपना, क़ानून तो होता ही है....!! - सीधी सच्ची बातें, जंगल जैसे लोग झेल नहीं पाते, घबराते हैं कहीं चीड़ों के झुरमुट में चाँदनी न बिखर जाए, और वो साँप सी रेंगती झूठी ईमानदारी की पटरियाँ, ...
उफ उफ गरमी, हाय हाय गरमी - आया मौसम गरमी का, आया मौसम नरमी का। गये कपड़े गरमी वाले, आये कपड़े गरमी वाले॥ गरमी आते खुल जाते पंखे, ए.सी, कूलर और हाथ के पंखे। जब आंख मिचौली करती बिज...
शब्दों में सपने... - [एक बाल-कविता] मैं प्रकाश में चला अकेला, यह जग भी सपनों का मेला, दृश्य अपरिमित, स्वप्न अनोखे, किसको देखें, आँख चुरा लें ! शब्दों में सपने लिख डालें !! बुढ़...
ओम साईं नमः - *कल साईं बाबा की तस्वीर देखते देखते मेरे मन में कुछ भाव आते चले गये । उन्हीं भावों को मैंने शब्दों का रूप दिया है। आइये साईं बाबा की शरण में हम सभी कुछ प...
काला धुंआ और कल-कल बहती नहर........ - सुबह का नजारा था. नहर में बहते पानी ने मन मोह लिया. वैसे भी मनुष्य एक सामाजिक "जीव" ही है. और जीव जन्तुओं का प्राकृतिक निवास तो जंगल ही है इसीलिये नदी,...
असली हिन्दुस्तान तो यहीं इस ब्लागजगत में बस रहा है....... - कितना अद्भुत है ये हिन्दी ब्लागजगत! जैसे ईश्वर नें सृ्ष्टि रचना के समय भान्ती भान्ती के जीवों को उत्पन किया, सब के सब सूरत, स्वभाव और व्यवहार में एक दूसरे ...
हमारी प्रार्थना का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या हो ?? - जब भी हमें किसी ऐसे वस्‍तु की आवश्‍यकता होती है , जिसे हम खुद नहीं प्राप्‍त कर सकते , तो इसके लिए समर्थ व्‍यक्ति से निवेदन करते हैं। निवेदन किए जाते वक्‍त ...
अमेरिका जा रही हूँ, पता नहीं कितने दिन बाद ब्‍लागिंग करने का सुख मिले - फोन की घण्‍टी बज उठी, मम्‍मी नमकीन रख लिया ना? इतने में ही बहु की आवाज भी सुनाई दे गयी, अचार रख लिया ना? इसके लिए उपहार, उसके लिए मिठाई। दाल, दलिया जो ले ज...
आज का धृतराष्ट्र, जो खुद ही बैल को उकसा रहा है। - एक आदमी नदी के किनारे बहुत उदास सा बैठा था। उससे कुछ दूरी पर एक संत भी बैठे थे, अपने प्रभू के ध्यान में। अचानक उनका ध्यान इस दुखी आदमी की ओर गया। संत उठ कर...
पहचानना मुश्किल तो है - पर पहचानने वाले तो पहचान ही जाते हैं। जब ताऊ पहेली में चित्र देखकर पहचानने के लिए भीड़ लग जाती है। तो यहां पर तो हिंट भी साथ में ही मौजूद है। मुझे पूरी उम...
  पता ही नही चलता कि भिखारी कौन और दाता कौन है--- - कहते हैं --एक मच्छर आदमी को क्या से क्या बना देता है । इसी तरह एक छोटी सी पिन कंप्यूटर का बेडा गर्क कर देती है । ये तो हमने अभी जाना । अब हुआ यूँ कि हम ज़न...
  महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया ! - महलों में झूठ के वर्क से कुछ और सजावट आ गई , लवों पर कुछ और कुटिल शब्दों की बनावट आ गई ! सरकार की महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया, क्योंकि मानवीय मूल्यों म...
सावन में आग लग गई................ - जबसे जिन्दगी एक हसीन सफ़र बन गई | दिल को उसी दिन से नई तलब लग गई || जालिम जमाना कहता सावन बरस रहा | मगर हम कह रहे सावन में आग लग गई || श्केहर कुमावत
यादों की फुलवारी में - सिल्क के टुकड़े पे वाटर कलर से पार्श्वभूमी बना ली...बाद में कढाई.. तितली बन,अल्हड़पन,चुपके से उड़ आता है,यादों की फुलवारी में,डाल,डाल पे,फूल,फूल पे,झूम,झूम म...
शुक्र है हमारे माननीय "जैसे" भी सही पर "ऐसे" नहीं !! - ' हमारे माननीय दूसरों से बेहतर हैं! शायद आपको विश्वास न हो क्योंकि आप उन्हें संसद में जोर-जोर से चिल्लाते, झगड़ते देखते हैं। लेकिन दूसरे देशों के सांसदों ...
पंख उड़ाती कहाँ चली- आकांक्षा यादव - तितली रानी,तितली रानी पंख उड़ाती कहाँ चली घूम रही हो गली-गली अभी यहाँ थी,वहाँ चली. काश हमारे भी पंख होते संग तुम्हारे हम उड़ लेते रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे मन ...
तीन धर्मों की त्रिवेणी – रिवालसर झील - हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले में मण्डी से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक झील है – रिवालसर झील। यह चारों ओर पहाडों से घिरी एक छोटी सी खूबसूरत झील है। इसकी हिन्दुओं,...
झूठ का हैन्डिल सब जगह फिट हो जाता है ...... - पाप के बहुत से हथकंडे हैं, लेकिन झूठ वह हैन्डिल है जो उन सब में फिट हो जाता है संसार के महान व्यक्ति अक्सर बड़े विद्वान् नहीं होते और न ही बड़े विद...
    इतना लम्बा सफ़र तय कर लिया और पता भी नही चला! - बात होती है प्रवृति की और ये मेरी प्रवृत्ति भी दोस्तों से लेकर मामूली जान-पहचान वाले को पता है कि मैंने अपने नाम को हमेशा सार्थक किया।अभी यंहा तो अभी वंहा ...
अब देखिए केवल  पोस्टों के शीर्षक-
अदालत में गुजरात दंगों के गैरजरूरी तथ्य, सुनवाई को मुद्दे से भटकाने के लिए रखे जा रहे!: सुप्रीम कोर्ट नाराज़[नामपुराण-9] पुरोहित का रुतबा, जादूगर की माया

‘‘प्रश्न जाल’’ ‘‘चम्पू छन्द’’
क्या गद्दारी हमारी परंपरा का हिस्सा है ?“उत्तर:आओ ज्ञान बढ़ाएँ: पहेली-30”
कादम्बिनी में 34 ब्लॉगरों सहित दो ब्लॉगों का उल्लेखमानव हृदय
| Author: अनामिका की सदाये...... | Source: अभिव्यक्तियाँ
समाज में नारी का स्‍थान
Author: आनन्‍द पाण्‍डेय | Source: महाकवि वचन
कि जी भर के संभोग sex करो तो
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ | Source: सतगुरु कबीर साहेब
तू मेरा , बाकी तेरा
| Author: sangeeta swarup |
Source: बिखरे मोती
आपको थोङा सोचने की जरूरत है 
rajeevkumarkulshrestha | Source: आत्मचिंतन...खुद को जानें
देसिल बयना - 28 : जिसके लिए रोएँ उसके आँख में आंसू ही नहीं
| Author: करण समस्तीपुरी | Source: मनोज
-- करण समस्तीपुरी
आज का धृतराष्ट्र, जो खुद ही बैल को उकसा रहा है।
| Author: Gagan Sharma, Kuchh Alag sa | Source: Alag sa
और अन्त में देखिए ये दो पोस्ट-
प्रेम की पाठ्यपुस्तकें नहीं होतीं - ** ** *सीरिया के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवियों में गिने जाने वाले महान अरबी कवि निज़ार कब्बानी (1923-1998) की कुछ कविताओं के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं ।…….
मेरा मन मुस्काया : रावेंद्रकुमार रवि का नया शिशुगीत - मेरा मन मुस्काया ------------ *खिल-खिल करके, खिल-खिल करके,* *मेरा मन मुस्काया! * *मेरी चिड़िया ने जब मुझको,* *मीठा गीत सुनाया -* *खिल-खिल करके, खिल-खिल करके,*...

Wednesday, April 28, 2010

“ब्लॉगारा हरकीरत हीर” (चर्चा मंच-135)

"चर्चा मंच" अंक - 135
चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक
आइए आज "चर्चा मंच" में 
ब्लॉगारा हरकीरत “हीर” 
के प्रोफाइल पर उपलब्ध परिचय के साथ
उनकी प्रथम और अद्यतन पोस्ट की  
चर्चा करते हैं -

[Untitled-1+copy.jpg]हरकीरत ' हीर'

मेरे बारे में

क्या कहूँ अपने बारे में...? ऐसा कुछ बताने लायक है ही नहीं बस - इक-दर्द था सीने में,जिसे लफ्जों में पिरोती रही दिल में दहकते अंगारे लिए, मैं जिंदगी की सीढि़याँ चढती रही कुछ माजियों की कतरने थीं, कुछ रातों की बेकसी जख्मो के टांके मैं रातों को सीती रही। ('इक-दर्द' से संकलित)

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हरकीरत ' हीर'

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ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਖੁਸ਼ਬੂ
 
बी एस पाबला निर्मला कपिला नीरज गोस्वामी ਬਲਬਿਂਦਰ manvinder bhimber
यह रही हरकीरत “हीर” की प्रथम पोस्ट-
एक ख़त इमरोज जी के नाम


(२१ सितंबर २००८ मेरे लिए बहुत ही महत्‍वपूर्ण दिन था। 
आज मुझे इमरोज जी का नज्‍म रुप में खत मिला। 
उसी खत का जवाब मैंने उन्‍हें अपनी इस नज्‍म में दिया है...)


इमरोज़ 
यह ख़त,ख़त नहीं है तेरा 
मेरी बरसों की तपस्‍या का फल है 
बरसों पहले इक दिन 
तारों से गर्म राख़ झडी़ थी 
उस दिन 
इक आग अमृता के सीने में लगी 
और इक मेरे 
जलते अक्षरों को 
बरसों सीने से चिपकाये हम 
कोरे का़गच की सतरों को 
शापमुक्‍त करती रहीं... 
शायद 
यह कागज़ के टुकडे़ न होते 
तो दुनियाँ के कितने ही किस्‍से 
हवा में यूँ ही बह जाते 
और औरत 
आँखों में दर्द का कफ़न ओढे़ 
चुपचाप 
अरथियों में सजती रहती... 
इमरोज़ 
यह ख़त, ख़त नहीं है तेरा 
देख मेरी इन आँखों में 
इन आँखों में 
मौत से पहले का वह सकूं है 
जिसे बीस वर्षो से तलाशती मैं 
जिंदगी को 
अपने ही कंधों पर ढोती आई हूँ... 
यह ख़त 
उस पाक रूह से निकले अल्‍फाज़ हैं 
जो महोब्‍बत की खातिर 
बरसों आग में तपी थी 
आज तेरे इन लफ्‍जों के स्‍पर्श से 
मैं रूह सी हल्‍की हो गई हूँ 
देख ,मैंने आसमां की ओर 
बाँहें फैला दी हैं 
मैं उड़ने लगी हूँ 
और वह देख 
मेरी खुशी में 
बादल भी छलक पडे़ हैं 
मैं 
बरसात में भीगी 
कली से फूल बन गई हूँ 
जैसे बीस बरस बाद अमृता 
एक पाक रूह के स्‍पर्श से 
कली से फूल बन गई थी... 
इमरोज़! 
तुमने कहा है- 
''कवि, कलाकार 'हकी़र' नहीं होते, 
तुम तो खुद एक दुनियाँ हो, 
शमां भी हो और रौशनी भी'' 
तुम्‍हारे इन शब्‍दों ने आज मुझे 
अर्थ दे दिया है 
भले ही मैं सारी उम्र 
आसमान पर 
न लिख सकी 
कि जिंदगी सुख भी है 
पर आज धरती के 
एक क़ब्र जितने टुकडे़ पर तो 
लिख ही लूंगी 
कि जिंदगी सुख भी थी 
हाँ इमरोज़! 
लो आज मैं कहती हूँ 
जिंदगी सुख भी थी …
और यह रही इनकी अद्यतन पोस्ट-
३० नंबर की बीड़ी ......
Posted by हरकीरत ' हीर' Friday, April 23, 2010 at 11:11 PM


ज़िन्दगी तेरा ज़िक्र अब ......रात के वजूद पर टिकी सुब्ह का सा है ...जिसे सूरज कहीं रख करभूल गया है ....इंतजार के पन्ने अब सड़ने लगे हैं ....और दीवारे अभी बहुत ऊंची हैं .....बहुत...... 
डालना कुछ और चाहती थी ....इक बड़ी प्यारी सी नज़्म उतरी थी ...पर शब्दों ने मुँह फेर लिया.....सागर की कविता (वही जिसपर हल्का सा विवाद हुआ था ) के एवज में भी कुछ लिखा थावह भी धरा रह गया ......शायद अगली बार ...... 

जाने कब 
मिट्टी के ढेर को 
उड़ा ले गयी थी सबा 
कब्र की कोख से 
उठने लगा था धुआं 
रात....अभी बहुत 
लम्बी है ..... 
तूने कभी पीया है 
बीड़ी में डालकर 
जहरीले अक्षरों का ज़हर ? 
नहीं न ? 
कभी पीना भी मत 
फेंफडे बगावत कर उठेंगे ... 
औरत पीती है 
हर रोज़ अँधेरी रातों में 
कुछ हथेली पे मल के 
होंठों तले दबा लेती है 
कुनैन की तरह 
ज़िन्दगी को ...... 
ये नज्में 
यूँ ही नहीं उतरती 
रफ्ता-रफ्ता धुएँ में 
तलाशनी पड़ती है 
अपनी परछाई 
और फिर ... 
३० नंबर की ये बीड़ी 
प्रतिवाद स्वरूप 
खड़ी हो जाती है 
विल्स के एवज में .....!!

Tuesday, April 27, 2010

“सस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान कृपया प्रकाश डालें!” (चर्चा मंच-134)

"चर्चा मंच" अंक - 134
चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक
अब काम का बोझ काफी हल्का हो गया है!
बृहस्पतिवार की चर्चा नियमितरूप से “अदा जी” कर रही हैं,
शनिवार की हँसती-मुस्काती चर्चा
रावेंद्रकुमार रवि लगा ही रहे हैं,
रविवार की चर्चा का काम मनोज कुमार जी ने
सम्भाल लिया है
और सोमकार की चर्चा करने के लिए
वन्दना गुप्ता जी ने सार्थक पहल कर दी है!
चर्चा मंच की ऐसी  जुझारू और सक्रिय टीम पाकर 
मैं अपने को धन्य मानता हूँ
और अपने इन नये सहयोगियों का
कोटिशः धन्यवाद करता हूँ
आज  "चर्चा मंच" पर सबसे पहली चर्चा है-

संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान कृपया प्रकाश डालें!
दिनेश दधिचि जी ने वास्तव में बहुत ही वैज्ञानिक प्रश्न
संस्कृत के आचार्यों से पूछा है?
उत्तर तो आपको बहुत से विद्वान दे ही देंगे
किन्तु मेरा मानना है कि इसी उलझन को हल करने के लिए
देवनागरी हिन्दी का उद्भव हुआ है
जो देववाणी संस्कृत की पुत्री है!
दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़
संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान कृपया प्रकाश डालें - हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में -- और मुझे लगता है -- अन्य भाषाओं में भी प्रायः संज्ञा व सर्वनाम के दो रूपों -- एकवचन और बहुवचन -- का प्रयोग होता है . प...
यदि आपको देशाटन में रुचि है
और समय का अभाव है
तो भाई नीरज जाट “मुसाफिर” की
चित्रों से सजी हुई पोस्ट अवश्य पढ़ लिया करें-
नीरज

हर मौसम घूमने का मौसम है - *(ये पोस्ट मेरे हम नाम भाई नीरज जाट जी की घुमक्कड़ी को समर्पित है)* कहीं पढ़ा था "घूमने का कोई मौसम नहीं होता, जब दिल करे तब घूमिये"...याने हर मौसम घूमने ...
निठल्ले व्यक्तियों के लिए टाइमपास करने की
चोखी विधि बता रहे हैं भाई ललित शर्मा-
ललितडॉटकॉम

सावधान निठल्ले कवियों........! - पति भी अब सम्पत्ति की तरह उपयोग में आने लगे हैं जैसे गहना, घर, फ़र्निचर, जमीन जायदाद या अन्य उपस्कर इत्यादि। जिन्हे आर्थिक संकट के समय बेच कर या गिरवी रख क...
घर में यदि बिटिया है
तो गुड़िया तो जरूर होंगी ही!
क्योंकि बिना गुड़िया के बिटिया अधूरी है -
शब्द-शिखर

पूजा से आरंभ हुई थी गुड़िया (Doll) की दुनिया - गुड़िया भला किसे नहीं भाती. गुडिया को लेकर न जाने कितने गीत लिखे गए हैं. गुडिया के बिना बचपन अधूरा ही कहा जायेगा. खिलौने के रूप में प्रयुक्त गुड़िया लोगों क...
इण्टरनेट प्रेमियों के लिए एक निराशाजनक खबर
लेकर आये हैं श्री बी.एस.पाबला जी-
ज़िंदगी के मेले

सावधान! अगले एक सप्ताह तक इंटरनेट सेवायें गड़बड़ा सकती हैं - लीजिए ज़नाब! एक मायूस कर देने वाली खबर आई है कि *इस सप्ताह, इटली के करीब समुद्र के अंदर केबल नेटवर्क में खामी की वजह से, भारत में ब्राडबैंड कनेक्शन सेवा प्...
ब्लॉगरों के हरदिलअजीज समीर लाल जी ने
दिखावे की दुनिया पर कुछ इस तरह से लिखा है-
उड़न तश्तरी ....

दिखावे की दुनिया.. - अर्थी उठी तो काँधे कम थे, मिले न साथ निभाने लोग बनी मज़ार, भीड़ को देखा, आ गये फूल चढ़ाने लोग... दुनिया दिखावे की हो चली है. कोई भी कार्य जिसमें नाम न मि...
हास्य और व्यंग्य से सजी हुई
रचना लेकर आये हैं दीपक मशाल जी-
मसि-कागद

एक मंचीय व्यंग्य कविता------------------------------------>>>दीपक 'मशाल' - आज से करीब १२ वर्ष पूर्व एक व्यंग्य कविता लिखी थी लेकिन शायद वो आज भी समसामयिक है, प्रासंगिक है और सालों तक रहेगी. लगा कि आपको भी पसंद आएगी... आती है या नह...
ताऊजी डॉट कॉम
पर आज हास्य व्यंग्य के रंग बिखेरे हैं
श्री तेज प्रताप सिंह जी ने-

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता मे : श्री तेज प्रताप सिंह - प्रिय ब्लागर मित्रगणों, हमें वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिये निरंतर बहुत से मित्रों की प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं. जिनकी भी रचनाएं शामिल की गई है...
अदा जी ने काव्यमंजूषा पर
नफरतों को घटाने वाली रचना प्रस्तुत की है-
काव्य मंजूषा

एक नई शुरुआत हो...... - बस !! आज का ही दिन है प्यार का वो एक दिन कल की क्या ख़बर, क्या जाने क्या बात हो कुछ आसान हो ये सफ़र न रास्ते में रात हो हो ख़त्म नफ़रत का ज़हर न धोखा ...
शिवम् मिश्रा जी अन्तरिक्ष की बातें लेकर आये है-
बुरा भला में-

एलियंस हैं, लेकिन संपर्क की कोशिश न करें !! - क्या इंसानों के अलावा भी अंतरिक्ष में जीवन है? जी हां है। यह मानना है दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक और विचारक स्टीफन हाकिंग का। लेकिन साथ ही वह यह भी कहते ...
नवगीत की पाठशालामें आतंकवाद पर
नवगीतों की कार्यशाला-8 
आगामी 29 अप्रैल से शुरू हो रही है-

कार्यशाला : ०८ : कुछ महत्त्वपूर्ण बातें - कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कार्यशाला : ०८ के लिए प्राप्त नवगीतों का प्रकाशन २९ अप्रैल से प्रारंभ किया जाएगा। इस बार विषय की घोषणा के बाद नवगीतों के प्रकाशन पहले...
परिकल्पना ब्लॉगोत्सव
इस समय अपने पूरे शबाब पर है-
 
हम लेकर आये हैं आज निर्मला जी की कुछ और गज़लें
ग़ज़ल अरबी साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा है जो बाद में फ़ारसी, उर्दू, और हिंदी साहित्य में भी बेहद लोकप्रिय हुइ। संगीत के क्षेत्र में इस विधा को गाने के लिए इरानी और भारतीय संगीत के मिश्रण से अलग शैली निर्मित हुई। हिंदी के अनेक रचनाकारों ने इस विधा को 
परिकल्पना  
रवीन्द्र प्रभात
भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं
chavanni chap (चवन्नी चैप)
जयपुर. हिंदी सिनेमा केवल मुंबई की बपौती नहीं है और मैं मानता हूं कि हर प्रदेश का अपना सिनेमा होना चाहिए। यह सिनेमा के विकास के लिए जरूरी है। यह बात जाने माने फिल्म पत्रकार अजय बrात्मज ने ‘समय, समाज और सिनेमा’ विषय पर हुए संवाद में कही। जेकेके के कृष्णायान सभागार में शनिवार को जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरीश चन्द्र संस्था की ओर से आयोजित चर्चा में उन्होने सिनेमा के जाने अनजाने पहलुओं को छूने की कोशिश की। उन्होने कहा कि मुझे उस समय बहुत खुशी होती है जब मैं सुनता हूं कि जयपुर ,भोपाल या लखन ...
ओ मेरे प्यारे 
एक प्रयास
  सुनो  तुम्हें ढूंढ रही हूँ जन्मों से  रूह आवारा भटकती  फिरती है इक तेरी  खोज में और तू  जो मेरे वजूद का  हिस्सा नहीं वजूद ही  बन गया है ना जाने  फिर भी क्यूँ मिलकर भी नहीं मिलता सिर्फ अहसासों में मौजूद होने से क्या होगा  अदृश्यता में दृश्यता को बोध  होने से क्या होगा नैनों के दरवाज़े से दिल के आँगन में अपना बिम्ब तो  दिखलाओ  इक झलक  पाने को  तरसती  इस रूह की प्यास तो  बुझा जाओ  ओ मेरे प्यारे राधा सा विरह  तो दे दिया मुझे भी अपनी  राधा तो बना जाओ…
हर दिन होली...
Author: चण्डीदत्त शुक्ल | Source: चौराहा
हे ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ....सररररारा सररररारा जोगीरा सररररारा सररररारा...खूब मचाओ धमाल...ना अंग की सुध रहे...ना कपड़ों की...चाहे जींस पहन रखी हो...चाहे बुशर्ट...टी-शर्ट हो या बरमूडा ही सही...आज तो बस गा लो जोगीरा...अरे भाई...होली है...होली है....बुरा ना मानो आज होली है...ठंडे पानी से भरी बालटी लाए हो! साथ में अबीर है क्या? एक चुटकी अबीर...। फाग क्यों नहीं गा रहे भाई?  नहीं आता...तो `रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ की तान ही छेड़ दो। कोई ना छूटे घर में, ना ही बचे कोई गलियन में...राह किनारे, बगियन में...जहां मिल ...
कुत्ते की मौत
  प्रतिभा कहाँ छुपी हो सकती है... किसे पता ? श्री सत्येन्द्र झा साहित्य-जगत में बिल्कुल अनसुना नाम है ! महोदय जल में कमल की भांति साहित्य की एकांत साधना में लीन हैं। झा जी सम्प्रति आकाशवाणी के दरभंगा केंद्र में लेखापाल के पद पर कार्यरत हैं। आप ने अपनी रचनाओं……मनोज    करण समस्तीपुरी




वह और भी सुखी है

वह सुखी है जिसकी परिस्थितियाँ उसके स्वभाव के अनुकूल हैं, लेकिन वह और भी सुखी है जो अपने स्वभाव को परिस्थिति के अनुकूल बना लेता है - ह्यूम   Albelakhatri.com
और अन्त में देखिए यह मजेदार कार्टून-
Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

कार्टून:- बुलेट ट्रेन के साइड-इफ़ेक्ट. -

"राम तुम बन जाओगे" (चर्चा अंक-2821)

मित्रों! सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...