चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Sunday, March 26, 2017

"हथेली के बाहर एक दुनिया और भी है" (चर्चा अंक-2610)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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साथ-साथ... 

तुम्हारा साथ  
जैसे बंजर ज़मीन में  
फूल खिलना  
जैसे रेगिस्तान में  
जल का स्रोत फूटना!  
अक्सर सोचती हूँ  
तुममें कितनी ज़िन्दगी बसती है  
बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो  
ज़िन्दगी में...  
डॉ. जेन्नी शबनम 
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मेरी कलम रुक जाती है... 

जाने कहाँ गए वो दिन? 
जाने कहाँ गया वो जूनून? 
जाने कहाँ गयी वो लगन? 
शब्द ही खो गए मेरे ह्रदय के. 
एक नए जोश के साथ आया हूँ इस बार, 
इस संकल्प के साथ कि 
अब तो लिखूंगा, बहुत लिखूंगा... 
Neeraj Kumar 
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719 

भगत सिंह- श्वेता राय
मेघ बन कर छा गये जोवक्त के अंगार पे।

रख दिए थे शीश अपनेमौत की तलवार पे।।
वायु शीतल,तज गये जोलू -थपेड़ो में घिरे।
आज भी नव चेतना बनवो नज़र मैं हैं तिरे।।
मुक्ति से था प्रेम उनकोबेड़ियाँ चुभती रहीं।

चाल उनकी देख सदियाँहैं यहाँ झुकती रहीं।।
मृत्यु से अभिसार उनकालोभ जीवन तज गया।
आज भी जो गीत बनकरहर अधर पर सज गया...
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मैं नास्तिक क्यों हूँ- 

भगत सिंह 

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है ... 
चौथाखंभा पर ARUN SATHI 
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Rarh and Rarhi 

राढ़ और राढ़ी--हरिशंकर राढ़ी (यह आलेख किसी जातिवाद या धर्म-संप्रदाय की भावना से नहीं लिखा गया है। इसका मूल उद्देश्य एक समुदाय के ऐतिहासिक स्रोत और महत्त्व को रेखांकित करना तथा वास्तविकता से अवगत कराना है।) महराजगंज के इतिहास और वर्तमान की बात हो तो राढ़ियों की चर्चा के बिना अधूरी ही रहेगी। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, महराजगंज बाजार प्रमुखतया विशुनपुर (राढ़ी का पूरा) की ही जमीन पर बसा हुआ है और इसकी स्थापना से लेकर विकास में राढ़ियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है... 
इयत्ता पर Hari Shanker Rarhi 
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अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद 

(चालीसवीं कड़ी) 

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.०६-१८.१०)                                                              (With English connotation)
मोह मात्र रहित होने पर, अपना स्वरुप ज्ञात है होता|
दृष्टि पटल विलीन होते ही, शोक रहित ज्ञानी है होता||(१८.६)

When one, whose vision is unclouded, becomes
free from ignorance and attachment and realises
his true nature, he lives without sorrow.(18.6) --

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परीक्षा 



पास या फेल

मेहनत का फल

मिल जाएगा


पास हो जाते

खूब मन लगा के

जो पढ़ लेते
  

चाय के प्याले

औ’ वक्ती रतजगे

काम न आये


एक ही चिंता

क्या पढ़ें क्या छोड़ दें

कल है पर्चा... 

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मसख़रों का ज़माना ... 

ख़रों को मुबारक ख़रों का ज़माना 
अजब सरफिरे रहबरों का ज़माना... 
साझा आसमान पर Suresh Swapnil 
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डॉ.हीरालाल प्रजापति का '' कविता विश्व '' 

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लो सप्त रंग घोल–घोल साथ ले जाओ ॥
कलंकहीनों के सँग होली खेलकर आओ ॥
रँगे सियारों को रँगने में रँग न ख़र्च करो ,
न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥
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Tuesday, March 21, 2017

चक्का योगी का चले-; चर्चामंच 2608


गौरैया 

Jayanti Prasad Sharma 
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खेतों में विष भरा हुआ है,
ज़हरीले हैं ताल-तलय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या?

अन्न उगाने के लालच में,
ज़हर भरी हम खाद लगाते,
खाकर जहरीले भोजन को,
रोगों को हम पास बुलाते,
घटती जाती हैं दुनिया में,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या...
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हरिपुरधार की रोमांचक यात्रा --- भाग - 2 

sushil kumar  
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दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥
खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥
इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम ,
इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥
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मौसम चुनावी 

Akanksha पर Asha Saxena 
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अंशदान 

RAAGDEVRAN पर
MANOJ KAYAL 
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बाप का साया 

Sudhinama पर sadhana vaid 
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"कुछ कहना है"

चक्का योगी का चले-

Yogi Adityanath

आज और बस आज ... 

मुसलसल रहे आज तो कितना अच्छा ... 
प्रश्नों में खोए रहना ... 
जानने का प्रयास करना ... 
शायद व्यर्थ हैं सब बातें ... 
जबरन डालनी होती है जीने की आदत 
आने वाले एकाकी पलों के लिए ... 
Digamber Naswa 

अब राष्ट्रपति-चुनाव की रस्साकशी 

pramod joshi 

उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-4 : 

भारतेंदु ने रेंग रहे लोगों को उठाया 

सुधीर राघव 

क्या नारीशक्ति यथार्थ है? 

Shalini Kaushik 

सुरेन्द्र वर्मा की कविताएँ 

Dr Abnish Singh Chauhan 

दोनों की तूफानी शैली बड़ा बवंडर लायेगी... 

नरेन्द्र से विवेकानन्द की भूमि को नमन 

smt. Ajit Gupta 

कार्टून :- रामलाल हाज़ि‍र हो. 

Kajal Kumar 

निगल और निकल 

यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है 

सुशील कुमार जोशी 

पथ भ्रष्ट नही कर पाओगे..... 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 

लड़कियों की जिंदगी 

Anusha Mishra 

"मैं नहीं,आपकी EVM खराब है जी"!! -  

पीताम्बर दत्त शर्मा 

PITAMBER DUTT SHARMA 

मज़बूरी’......मीनू परियानी 

yashoda Agrawal 

वो प्यार तुम हो...!!! 

Sushma Verma 

वादे मोदी के -इरादे योगी के 

Randhir Singh Suman 

आज शीतला सप्तमी पर होली की आग का ठंडा करके होली के त्योहार का समापन होता है, तो अपनी अत्यंत ठंडी ग़ज़ल लेकर आ रहे हैं भभ्भड़ कवि भौंचक्के। 

पंकज सुबीर at सुबीर संवाद सेवा

उड़ान का आभाष 

shashi purwar 

HARSHVARDHAN TRIPATHI 

प्यार पर 
Rewa tibrewal  

शब्द सक्रिय हैं पर सुशील कुमार  
*वो लड़की * 
*अक्सर देखती रहती * 
*सूर्य किरणों में उपजे * 
*छोटे सुनहरी कणों को * 
*हाथ बढ़ा पकड़ लेती * 
*दबा कर बंद मुट्ठी में ... 

सु-मन (Suman Kapoor)  

गीत "दिल तो है मतवाला गिरगिट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 

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